Thursday, 28 January 2016

मेरी ज़िम्मेदारी


वो माँ का झूठ मूठ में पतीला खनकाना 
सब भरपेट खाओ बहुत है खाना 
फटी हुइ साड़ी को शाल से ढक लिया 
मेरी फीस का सारा जिम्मा अपने सिर कर लिया 
रात में ठंड से काँपती रहे
और मुझे दो-दो दुशालें से ढांपती रहे 
मैं बरस दर बरस बढ़ता गया 
मेरी भावनाओं, ख़यालातों का दायरा घटता गया 
मैंने तुझसे दूर जा कर 
सिक्कों का महल बनाया 
वक्त को मोहरा बना कर 
तरक्की के सारे दरवाज़ों को खोलता गया 
पर तेरी ओर जाने वाले दरवाजे को खोलना ही भूल गया 
दूर रहकर भी तू पूछती 
तेरी आवाज़ कुछ सर्द है
क्या जीवन में कुछ कमी या कोइ दर्द है 
माँ तेरी बीमारी, लाचारी 
डाक्टर और दवा का इतंज़ार 
धंसती आँखें बंया कर रही थी
जर-जर होते शरीर की कहानी बार-बार 
पिता का काँपते हाथों से 
पुरानी दराज़ में पैसे टटोलना 
अनुभवी आँखों का सही अंदाज़ा
पर कुछ ना बोलना 
बेबसी और लड़खड़ाते कदम
आखिरी सांस और
अनंत आशिर्वाद और प्यार का संगम
ईश्वर मेरे बेटे को हमेशा ख़ुश रख़ना
उसके हिस्से के दुख़ दर्द मेरे सिर करना 
माँ तुझे मेरे प्यार और सहारे की चाहत
जाने क्यों नहीं दी मैंने उन्हें राहत

Thursday, 31 December 2015

मुखौटों का शहर


तुम इतना तेज मत चलो 
इतने आगे निकल तो गए हो 
पर कम से कम पल दो पल तो रुको 
रुख कर चलने के बीच 
इतना वक्त तो हो मेरे मीत
इंतज़ार जो तुमने किया हो मेरे लिए 
उसका मुझे अहसास तो हो 
मेरे प्यार में इतना हो दम 
मेरे इंतज़ार में थम जाए तुम्हारे कदम 
तुम्हारी आगे बढ़ने की चाह 
बदल देगी हमारी राह 
बहुत ऊँचाई तक तुम पहुंच गए हो
अगर तुम मुझे हाथ बढ़ा कर थामते
मैं भी उन उचांइयो को महसूस करती 
अब खत्म सी हो रही है कदमों की समानता 
हाथ की ठंडक से पता चल रही है 
रिश्तों की गर्माहट 
सुनहरे सपनों में उलझ कर बहुत दूर निकल गए 
बीच में वक्त के थफेड़ों ने
मिटादी पुरानी यादों की कहानी
आख़रि पड़ाओं पर 
हमारी मुलाकात वास्तविक नहीं थी 
बातों और मुलाक़ातों से ही समझा 
की आगे यात्रा
मिटा देगी मेरा अस्तित्व, क्योंकि?
अब तुम मुखौटों के शहर में
जो आ गए हो 
जहां कदम कभी थकते नहीं 
एक दूसरे का पीछे छोड़ने की चाह में 
सांस लेने को भी लोग रुकते नहीं

Thursday, 17 December 2015

माँ का इंतज़ार


माँ मुझे आज भी तेरा इंतज़ार है 
पता नही क्यों ?
तू आती है मिल्ती है और 
प्यार भी बहुत करती है 
तुझे मेरी फिक्र भी है 
पर मुझे तेरा इतंज़ार है 
कल कोइ मुझसे पूछ रहा था 
अरे पागल कैसा तेरा ये इतंज़ार है
मैं तुम्हें नहीं बता सकती
बात बरसों पुरानी है 
वो मेरा नन्हा सा मन 
सालों बाद भी; मेरे अंदर 
छुप कर बैठा है 
और सवाल करता है 
अपने आप से बार-बार  
वो सवाल आँखों में 
छुप गया है आँसू बना
होठों पर आते-आते रुक गया है
कुछ मन में फाँस बन चुभ गया है 
तूने मुझे अपने से अलग कर कहा था 
मैं यहाँ खुश रहूंगी 
और तू मुझसे मिलने 
आया करेगी कभी-कभी 
वो कभी-कभी शब्द 
मेरे मन से कभी नहीं निकला 
वो तेरा कहना आया करूँगी 
मेरे लिए इतंज़ार शब्द बन गया 
और वो बचपन का इतंज़ार 
मेरे अदंर डर बना कर ऐसे छुप गया कि
वो कभी ख़ुली हवा में निकला ही नहीं 
और वो इंतज़ार शब्द 
अपाहिज हो गया 
अब वो चल नहीं सकता है 
इसलिए मेरे अंदर से निकल नहीं पाता है ।

चित्र गूगल के माध्यम से 

Thursday, 3 December 2015

जब बात सबूतों की चली


तुमने बड़ी खामोशी से लौटाए कदम
पर मेरे दिल पर दस्तक हो ही गई मेरे हमदम 
आते हुए कदमों में एक जोश था
लौटता हुआ हर कदम ख़ामोश था 
वो शिकायतों की गिरह ख़ोल तो देता 
जो तूने अपने मन में बांधी थी
दो लफ़जों में बोल तो देता
नासूर जो तूने बिना वजह पाले
उसकी दवा मुझसे पूछ तो लेता, ओ मतवाले 
चाँद को गवाह बना कर किए थे जो वादे
क्यों भोर होने तक कमज़ोर पड़ गए तेरे इरादे 
तेरी नज़रों का वो धोख़ा था 
वो धुँध में जो साया था 
वो मेरा वजूद था 
वर्षों से मुझमें समाया था 
वो मेरा आत्मसम्मान था 
जो तुझ से टकराया था 
तुम बात सबूतों की मत करो 
कभी अपने गिरहेवांह में भी झाँका करो

Monday, 23 November 2015

उम्मीद की इबारत


सारी जिंदगी ढूँढती रही
न मंजिल मिली न किनारा 
न शब्दों का अर्थ  
अनवरत चलते कदम 
कभी थकते हैं कभी रुकते हैं 
बस झुकना,
वो कमबख़्त वक़्त भी
नहीं सिखा पाया 
ये उम्मीद शब्द 
मैने सुना जरूर है 
मेरी कलम उसे
बहुत अच्छे से लिख लेती है
पर मेरा मस्तिष्क उसका अर्थ
ढूँढ पाने में बहुत असमर्थ है
क्योंकि उसका अर्थ 
जो तुम बता गए थे
उस तरह का मिलता ही नहीं 
न जाने कौन लिखता है
तकदीर की इबारत
क्यों वो सामने आता ही नहीं 
वर्ना जिंदगी में 
इस पार या उस पार 
कहीं तो अपना अर्थ लिए 
मुझे उम्मीद मिलती 

Sunday, 4 October 2015

पत्थर बोलते नहीं


जब तुम गए मैने देख़ा ही नहीं 
क्या -क्या अपने साथ ले गए
अब मेरा बहुत सा सामान नहीं मिला रहा 
ज़्यादा कुछ नहीं बस दो चार चीज़े हैं 
मैने तुम्हें हर उस जगह पर तलाशा जहाँ तुम हो सकते थे
एक मेरा विश्वास; एक मेरी परछाई
मेरी अंतर आत्मा; मेरे शब्द 
पर तुम कहीं नहीं मिले 
मेरा सामान तो लौटा जाते 
इस बिख़रि हुइ जिंदगी को समेटने के लिए
जो तुम ले गए वो विश्वास चाहिए 
इस जीवन के कोरे कागज को 
लिख़ने के लिए वहीं शब्द चाहिए 
मेरी अंतर आत्मा बहुत ख़ामोश है
उसका मौन तोड़ने के लिए वार्तालाप का प्रहार चाहिए 
मुझे तो नहीं पर हाँ मेरी परछाइँ को आदत थी
तुम्हारे साए से रूठने और मनाने की  
उस परछाइँ को हो सकता है इतंज़ार हो 
कह दो कि तुम मेरा सामान तो लौटाने आओगे एक बार 
इंतज़ार करती आँख़ें पथरा जरूर गई हैं
पर अब ये तुम्हें नहीं रोकेंगी रोड़ा बन 
क्योंकि पत्थर बोलते नहीं

Wednesday, 30 September 2015

परिंदे


परिंदे नहीं होते स्वार्थी
ख़ुल कर जीते हैं
आख़िरि सांस तक 
निस्वार्थ भाव से सिख़ाते हैं
अपने बच्चो को उड़ना
ख़ुल जाते हैं जब बच्चो के पंख़ 
नहीं उम्मीद करते की
ये मुड़कर लौटेगा भी की नहीं 
आने वाला कल 
घोंसला ख़ाली होगा की भरा 
कैसे रह पाते होंगें 
उनके अपने जब दूर चले जाते होंगें
उनके आँसू उनका दिल उनका इतंज़ार
क्या वो घोंसले से निकाल फ़ेकते हैं
और उड़ जाते हैं सब कुछ झटक कर
कहीं बहुत दूर बिना यादों के