Tuesday, 17 May 2022

माँ तुम यहीं हो

पवित्र नदीजिसे हम 
माँ नर्मदा कहते हैं
अक्सर जाती हूँ 
और सीढ़ी पर बैठ कर 
घंटो ख़ामोशी से बहती 
नदी को देखती रहती हूँ
मैं कई दिनोंमहीनोंसालों से 
कुछ तलाश रही थी 
घाट की सीढियाँ उतरती हैं 
गहरे पानी में 
आखरी सीढ़ी से टकराते पानी की 
आवाज़ मुझे खींच रही थी 
उस आवाज़ का अनुसरण कर 
वहां जाती हूँ 


उस आखरी सीढ़ी पर 
बैठ कर टकराते पानी की 
आवाज़ सुनती हूँ समझती हूँ 
मेरी तलाश को एक 
मुकाम हासिल होता है 
उस टकराते पानी को 
ध्यान से सुनती हूँ 
उस आवाज़ में मुझे 
अहसास होता है की 
माँ तुम यहीं हो 
माँ नर्मदा ने 
मुझे मेरी माँ से मिला दिया 
अब माँ के जाने के बाद 
जब भी मन करता है 
उनसे मिलने का 
आखिरी सीढ़ी के टकराते पानी से 
बातें कर लेती हूँ 
एक माँ ने मुझे मेरी माँ लौटा दी

Sunday, 6 March 2022

कुछ पंक्तियाँ



~ 1 ~

 उस मोड़ का वो ढ़लान 

जहाँ मेरा रास्ता अलग हो जाता था

उसकी गवाह वो

गुलमोहर और नीम की 

बंटी हुई छांव



~2~

जीवन की जंग में 

रोज़ मैं अपने 

हथियारों को तराशती हूँ 

पर दुनियाँ से 

जब रूबरू होती हूँ 

तो पाती हूँ 

अभी और धार बाकि है



~ 3 ~

कर्मों की कश्ती 

 जाने किस दरख्त 

को काट कर बनाई जाती है 

एक खासियत बड़ी अच्छी है 

इसमें, कि एक दिन 

हमारे पास वापस लौट कर 

ज़रूर आती है





~ 4 ~

बहुत सी यादें थी 

कुछ सुलझी 

कुछ उल्झी 

उनमें से चुनना मुश्किल था 

फिर मैंने एक फैसला लिया 

उन्हें वक्त पे छोड़ दिया 

और फिर जिरह चलती रही 

तारीखें बदलती रही



~ 5 ~

उसने सर्द अल्फ़ाज़ों 

से कहा 

ज़िन्दगी भी रात की तरह है 

चांदनी सी चमक बहुत है 

चारो तरफ 

पर किस्मत का हर सितारा 

टूटा हुआ है



~ 6 ~

इस शहर की सर्द हवाएं 

मुझसे होकर गुज़री 

कुछ तुझसे 

हवाओं की गुफ्तगू 

ने हौले से फ़रमाया 

हम एक ही शहर में हैं



~ 7 ~

एक उलझी हुई 

उदास होती शाम 

कुछ खाली प्याले 

कुछ आधे भरे हुए 

कांच कुछ टूटे 

बिखरे हुए 

पर इन सबसे 

जुड़ी हुई 

एक कहानी 

शायद सुनी किसी ने नहीं 

पर अनकही 

भी तो रही नहीं


Sunday, 13 February 2022

जाड़े की रातें, किस्मत की बातें


 जाड़ों की सर्द रातें 

कॉफी के मग 

फायर प्लेस की लपटें 

महंगे कंबलों की गर्माइश 

कल के भविष्य की चिंता में 

नींद की तरसती आँखों 

का ख्वाब 

काश एक नींद का 

टुकड़ा मिल जाता 

एक सर्द रात में 

जीवन के दो बिखरे हुए हालात 

पटरी पर सोती 

पतले कम्बलों में 

ठिठुरती ज़िन्दगी 

बिछावन की जगह आज का अखबार 

जिसकी हैडलाइन है,

"आज वर्ष का सबसे ठंडा दिन है"

आधे फटे कम्बल में 

चिपटा हुआ 

गली का आवारा कुत्ता 

ठंडी और राख हो चुकी 

खोखे वाली लकड़ी की आग 

दिन भर की मज़दूरी के बीच 

नींद बहुत गहरी है 

आज में जीता 

आज पेट भरा है 

कल मेरा वजूद 

ज़िंदा है या मरा 

किसी को शायद 

फर्क नहीं पड़ेगा 

पर नींद के ख्यालों में 

एक ख्वाब है कहीं 

काश एक और

कम्बल का टुकड़ा मिल जाता 

ये जाड़े की रातें 

बड़ी अजीब हैं ये 

किस्मत की बातें 



Wednesday, 12 January 2022

मेरी आवाज़ खो सी गइ है कहीं


 ज़माने की रौनक में 

ज़िन्दगी ढूंढने का मसला 

रफ़्तार के बीच 

कहीं पीछे छूट जाने का डर 

पहचान को बरक़रार 

रखने की जद्दोजहत 

हुज़ूम के बीच की ज़िन्दगी 

जहाँ तिल भर भी हिलने की 

जगह न हो 

कभी कभी भ्रम होता है 

जीवन को सांसे 

मिल भी रही है की नहीं 

कोई खेल रहा है 

तुम्हारे साथ 

ताश की बाज़ी 

कौन सा पत्ता अब 

टेबल पर पड़ने वाला है 

बढ़ता टेंशन का लेवल 

मेरी आवाज़ मुझमें ही 

खो सी गइ है कहीं 

दुनिया के बाज़ार में

शब्द सब खर्च हो गए हैं 

जीने के लिए अगले 

दिन में ढकेल दिए 

जाते हो 

इतनी रफ़्तार में 

दोस्त और दुश्मन

दोनों को समझ पाना 

बड़ा मुश्किल है

प्यार और नफरत 

सिक्के के दो पहलु

पर सिक्का अब

घूमता ही रहता है

बहुत तेज़ी से 

जिससे की तुम 

कुछ महसूस ही 

नहीं कर पाओ 

जब दूभर हो जाता है 

इन सब के बीच जीना 

तब अकेले निकल पड़ना 

लॉन्ग ड्राइव के लिए 

सन्नाटे की खोज में 

जहाँ अपनी आवाज़ 

लौटकर खुद अपने 

को सुनाई दे 


Saturday, 6 November 2021

कुछ पंक्तियाँ दिल से


~ 1 ~

 तरक्की की वो दौड़ 

हर मायने खो देती है जनाब 

जिसमें माँ - बाप का हाथ 

उनके बच्चों से छूटता जाए 


~ 2 ~

वक़्त ने सीखा और समझा दिया 

बहुत सी भीड़ रही अपनों की 

पर सारी ज़िन्दगी

अकेले ही चलते रहे


~ 3 ~

शहर में बड़ी चहल पहल है 

लग रहा है खूब बिक रही हैं मेरी यादें 

तूने उसकी बोली 

बड़े सस्ते दामों में जो लगा दी 


~ 4 ~

मैंने कहा चली जाओ 

मेरी ज़िन्दगी से 

पर वो कहाँ मानने वाली थी 

तेरी यादें 

तेरी तरह उनको भी 

अड़े रहने की 

पुरानी आदत जो ठहरी 


~ 5 ~

मेरी खामोश यात्रा का वो मुसाफिर 

बात कुछ भी नहीं हुई 

पर पता नहीं क्यों 

आज तक उसके किस्से 

ख़त्म ही नहीं हो रहे


~ 6 ~

मेरे दुपट्टे के हर मकेश के साथ

धागे की जगह 

तुम्हारी यादें टकी हुई हैं 

कल मैं गइ थी 

कारीगर के पास 

मकेश निकलवाने 

उसने कहा इन्हे उधेड़ने से 

सब कुछ तार - तार हो जाएगा 

Friday, 15 October 2021

बीते हुए लम्हें




मैंने यादों को सफ़ेद लिबास में

दफ़्न होते देखा है

कल किसी ने दस्तक दी

दरवाज़े पर

मैंने पूछा कौन है

उसने कहा मैं हूँ बीता हुआ लम्हा

क्या मैं अंदर आ जाऊँ..

मैंने कहा आओ

ये किस बच्चे को साथ ले आए

उसने कहा ये तुम्हारा बचपन है

बहुत दिनो से ज़िद कर रहा था

तुम्हें अपने साथ अपने शहर

ले जाने के लिए

पुराने घर में पुराने दोस्तों के साथ

वो जानी पहचानी वाली सड़कों

का शहर छोटा सा शांत

चूल्हे की सौंधी रोटी

नदी का किनारा

बड़ी सी मुस्कुराहट

वाला भोला सा बचपन

इमली आम कच्चे जाम

दोपहर की सस्ती क़ुल्फ़ी

चाँदनी रात में बिछावन

कल नहीं था सोचने को

आज में जी भर कर जीने वाले

बड़े शहर के जाल में

पक्षी सा फँस के

रह गया जीवन

कब पंख टूट कर

बिखर गये

वापस अपने शहर

न आ सके

उस पुराने मकान से

जुड़ी हुई थी कईं यादें

आज उसके गिरने से

सब टुकड़े टुकड़े सा

बिखर गया

मैंने यादों को

सफ़ेद लिबास में

दफ़्न होते देखा है...

Saturday, 12 June 2021

तुम आओ तो सही ...

-1-

 मेरे दस्तावेज़ों में 

तू अब भी ज़िंदा है 

मैंने अपना 

अतीत और वर्त्तमान 

सब तेरे नाम की 

वसीयत में जो लिखा है 

~~~~~ 


-2-

इतनी रफ़्तार से 

तुम आशियाने मत बदलो 

दरवाज़े पे 

बस इतना लिख देना 

की तुमने अपने आप को 

तब्दील कर लिया है 

~~~~~ 


-3-

चलो आज झगड़ा 

हमेशा के लिए 

ख़त्म करते हैं 

बहुत सारी शिकायतें 

तुम रख लो 

नाकाम मोहब्बत का इल्ज़ाम 

मैं रख लेती हु 

~~~~~ 


-4-

तुम आओ तो सही 

मेरी कब्र पर एक बार 

दोनों शब्दों के अर्थ 

तलाशने नहीं पड़ेंगे 

एक खामोशी, दूसरा इंतज़ार ...