Sunday, 30 August 2020

कुछ पंक्तियाँ


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 उसने पूछा ये ठहाके 

का राज़ क्या है 

आँखें खामोश थी 

गम को कहीं तो

ठहरना था 

आज हसी में ही सही 

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उसकी निशानियां 

अब बंद पड़ी हैं मेरे पास 

वो संदूक तो जंग खा गया 

पर वो बेजान चीज़ें 

अब भी उतनी ही 

खूबसूरत हैं यादों की तरह 

सोचती हूँ काश कभी 

यादों को भी जंग लग जाए 

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अपने शहर के रास्तों पर 

खड़े हो कर 

जब ये सोचना पड़ जाए 

की अब जाना कहाँ है 

तब ये अहसास होता है 

मेरा शहर अब 

मुझे भुलाने लगा है 

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वो कलम मेरी बड़ी दुश्मन थी 

जब भी खत में तुझे 

तेरी शिकायत में उतारना चाहा 

अक्सर टूट जाया करती थी 


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वो मज़दूर सब आलिशान आशियाने की 

छत मरम्मत कर आया 

पर अपने घर की छत से टपकते पानी ने 

उसे समझाया 

मौसम बदलने का इंतज़ार 

किया जा सकता है 

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Saturday, 15 August 2020

तुम्हारे शहर की बूँदें


 बारिश में जब भी तुम्हारे 

शहर गया 

न तो तुम दिखी 

न मुलाक़ात हुई 

पर बहुत सी बूँदें 

तुम्हारे शहर की 

छाते में सिमट कर आ गईं 

कई दिनों से 

वो यादों की सीलन 

महका रही थीं 

कमरे को 

उन्हें मिटाने के लिए 

आखिर मैंने

आज कड़ी धूप में 

छाता खोल कर सुखा दिया




Sunday, 21 June 2020

सरहदों से तुम्हारा आना



सरहदों से तुम्हारा आना
पलाश के फूल की तरह 
वहीँ तो खिलते हैं 
उमीदों की तपती दोपहर में 
तुम आओगे तो न 
बहुत दिनों से कह तो रहे हो 
पर आने के तुम्हारे संदेशों में 
इंतज़ार मुझे हराता नहीं है 
वो ख़त्म होती ख़ुशी को 
रोज़ मैं 
खींच कर, खरोंच कर 
बचा कर 
जी रही हूँ 
फिक्रमंद ज़िन्दगी रोज़ मरती है 
और ये परेशानियों का अब्र 
चाहिए बहुत सारा सब्र 
बड़े शहरों के बड़े वादे 
और तू भी आने की बातों के 
फरेब में जीना सिखा दे 
पीली पत्तियाँ और ये पतझड़ 
इन्ही के बीच 
कहीं न कहीं 
नई कोपलें भी होंगी 
हर कोने में उदासी फ़ैल रही है 
तुम थोड़ा जल्दी आ जाना 
मैंने एक शोख रंग बचा रखा है
उसे हम ख़ुशी में घोल देंगे 
सच कहो तुम 
इंतज़ार की हद के 
गुजरने से पहले तो
आ जाओगे न 

Saturday, 9 May 2020

गांव बहुत दूर है

कारखाने से मिली बची तन्खा 
को लेकर 
लौटते समय मन ने सोचा, 
शायद ही अब दोबारा जी पाऊं 
घर की देहलीज़ पर 
कांपते कदमों ने अपनी बेबसी सुना दी 
मेरा काम छूट गया 
हमें अब पैदल ही 
अपने गांव जाना होगा 
पसीने से तर हथेली ने 
नोटों को कस कर भींच लिया 
कोई छुड़ा न ले जाए 
मासूम गोल मटोल आँखों का सवाल 

"बाबा मेरे जूते तो
सूरज काका ने सिए ही नहीं "
मेरे दिमाग के दरवाज़े बंद हैं
सोचने को कुछ नहीं है 
मेरी झोली में, 
रघु का दूसरा सवाल 
"बाबा मुन्नी ने तो 
चलना ही नहीं सीखा "
मन ने कहा अगर आता तो भी क्या 
मंज़िल अब धुआं धुआं है.. 

कजरी ने बचे हुए सामान को 
फैक्ट्री के कबाड़ खाने में रखा
तो आंसू की दो बूँद ने 
सामान पर अपने हस्ताक्षर कर दिए 
वापस मिलने की उम्मीद पर
कजरी का सवाल
"रघु के बाबा, हम वर्षों से
गांव नहीं गए 
तुम्हे रास्ता याद तो है ना "
उसके दिमाग में 
काम गूँज रहा है 
मशीनें शोर कर रही है 
साहब ने कहा था 
"जिस रास्ते को तुम बना रहे हो 
वो सीधा तुम्हारे गांव को जाता है "
मैं बहुत खुश था 
मेरा गांव और मेरे गांव को जाने वाली सड़क.. 
पर आज जब चल कर 
उसी सड़क से लौट रहा हूँ 
मेरे पसीने की बूंदे 
जो गिरी थी कॉन्क्रीट पर.. 
चमक रही है 
मृगमरीचिका बन कर 
अब इस अनिशचिता वाले
जीवन में 
मैं सड़क के 
न इस छोर पर हूँ 
न उस छोर पर 
बस अपनों का हाथ थामें 
इस आवारगी और 
बंजारेपन में 
शायद ही दोबारा जी पाऊं 
मौत तुम आना मत 
पहले मैं गांव तो 
पहुँच जाऊं ..

Tuesday, 10 March 2020

वो तलाश


वर्षो बाद बरसात की रात
अजब इत्तेफाक की बात
रात के पहर दस्तक
दरवाज़े पर था कोई रहवर
जैफ ने पनाह मांगी
मेरे घर के चरागों में
रौशनी बहुत कम थी
परफ्यूम की खुशबु जानी पहचानी थी
पर उसकी अवारगी और कुछ खोजती निगाहें.. 
मेज़ पर रखी काॅफी को
जब उसने झुक कर उठाया
रेनकोट के ऊपर वाले जेब में
मेरी तस्वीर जो बहुत पुरानी थी
जिस मोड़ को मैं छोड़ आई थी
बंद किए किस्से में वो दस्तक
नया हिस्सा जोड़ गई
वो कुछ नहीं बोला
और बारिश थमने के बाद
अलविदा कह कर चला गया
फिर से अजनबी बनने
पता नहीं अब बारिश कब होगी
काश मैं चुपके से 
जेब की तस्वीर बदल पाती
उसकी वो तलाश मुकम्मल हो जाती..

Wednesday, 3 April 2019

तुम्हारा उपहार



कभी फादर्स डे कभी मदर्स डे
हर साल आते हैं 
सब कुछ मिलता है 
बाज़ारों में उपहारों के लिए 
पर नहीं मिलता तो वो वादों के शब्द
जो चाहिए होते हैं हर माता - पिता को 
क्योंकि वो दुकानों में नहीं दिलों में बिकते हैं 
और एक आश्वासन और विश्वास की
नज़रों के नर्म गिफ्ट पेपर से लिपटे हों अहसास
की हाँ हम होंगे
जब आपको ज़रूरत होगी 

तुम होना तब
जब हम बच्चे बन जाएँ
और तुम हमारे अभिभावक 
वही ममता वही धैर्य
वही प्यार वही अहसास
लौटाने की बारी हो
अर्थ परिस्तिथियाँ 
समय सब बदलती हैं 
न बदलना तुम 
जब तुम्हारी बारी आए
अभिभावक बनने की 
जब हम बच्चे बन
मांगे मन चाहा खाना 
और कांपते हाथों से 
गिरा लें अपने ऊपर 
और टूट जाए महंगी प्लेट 
क्या तुम हमे दोबारा खिलाने तक 
धैर्य को मुट्ठी में बांधे रखोगे 
जब अल्ज़ाइमर से घिर जाएँ 
भूल कर बार बार एक ही बात दोहराएँ  
तुम्हारे पास हमे बहलाने के लिए 
चंद लम्हे तो होंगे न
वो उम्र दराज़ होती नींद 
आँखों से गायब होती जाती
क्या तुम हमारे साथ जागोगे
अब वक़्त बदला जो है
अब हालातों की परीक्षा हमारी है 
परिणाम की चिंता तुम्हे 
तुम्हारे हर इम्तेहान में जाग कर 
सफलता की सीढ़ियों तक छोड़ आए हैं 
हमारे कदम लड़खड़ाएंगे और 
काया होगी कमज़ोर 
क्या तुम सहारा दोगे 
रुक रुक कर चल सकोगे
जैसे हम तुम्हे हाथ पकड़ कर 
चलना सिखाया करते थे 
हमारी आँखों की होगी जब 
रौशनी कम
क्या तुम हमें पढ़कर 
सुनाया करोगे
नहीं हम तुम्हारी तरह 
परियों वाली कहानी 
सुनने की ज़िद नहीं करेंगे 
बस डॉक्टर की दवा 
कितनी दफे खानी है 
इतना ही पढ़ देना 
तुम्हे हैरान नहीं करना है 
बस हर मदर्स डे और फादर्स डे पर 
एक वादा दे दिया करो 
बस इतना सा उपहार काफी है 
हमारा हाथ पकड़ कर विशवास से 
तुम्हारा हाँ कहना ही 
सब उपहार पर भारी है . . . 

Saturday, 18 August 2018

भागती ज़िन्दगी


चाँदनी रात के साये में 
जागते और भागते लोग 
आँखों में नींद कहाँ है 
सपने आँखों से भी बड़े हैं 
न नींद में समाते 
न आँखों को आराम पहुँचाते 
आज की रात खत्म होती नहीं 
उससे पहले कल का दामन 
थामने की जल्दी 
ज़िन्दगी ने तो जैसे
जद्दो - जहद की हद कर दी 
कासिब का हिसाब 
कदो हैसियत से छोटा होता जा रहा है
ये चाँद और सूरज
शहर को जगाते और
भगाते हैं 
उम्र से लम्बी सड़कों पर
भागने वाला मन 
आँखों के सपने 
एक दिन खुली हथेली से 
फिसल कर 
दूर कहीं टूट कर 
बिखर जाते हैं 
लम्हा लम्हा पकड़ने की चाह में 
ज़िन्दगी पता नहीं कब 
राख होकर उड़ जाती है