आज बारिश बरसते हुए
मेरे साथ मुस्कुराई
उसने कहा, आज मैं
आँखों के पानी की तरह
नहीं बरसूँगी
मुस्कुराहट के मोतियों सी
बिखरुंगी
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी
खिड़की के शीशे पर
देर तक ठहरूंगी
तुम वही बैठ कर
कुछ लिखना
मैं तुम्हारी स्याही को
नहीं फैलाउंगी
पर आज तुम मुस्कुराना
आज मैं तुम्हारे शहर से
दूर नहीं जाउंगी
तुम कॉफ़ी का मग
खिड़की पर ही रखना
भाप और ओस से
धुंधले हुए शीशे पर
अपनी अँगुलियों से
उन गुज़री हुई
तारीखों को लिखना
कब तुम्हारी मुस्कुराहट
खिलखिलाहट में बदल गई
और कब डायरी
इंतज़ार शुरू और खत्म
होने की तारीखों
दिनों महीनों सालों की कहानी
उन उजले सफों पर
स्याही में तब्दील हो गई ...


