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Tuesday, 26 May 2026

बचपन हॉस्टल घर

वो ख़ामोशी बचपन में 

हॉस्टल की 

मेरे अंदर धीरे धीरे 

घर करने लगी थी 

शब्द जुबां पर कम 

ज़ेहन में ज़्यादा 

जमा होने लगे थे 

कलम कागज़ की 

किल्लतें हो चली थी 

स्याही की दवातों के 

अम्बार भरभराने लगे थे 

कमरा टेबल और मैं 

शब्दों से भरे

कागज़ों का ढेर 

बचपन के साथ साथ 

बढ़ते गए भावनाओं के चिनार 

चन्द दिनों भीड़ में 

गुज़ारने के बाद

वापस खामोशी की ओर 

रुख करना 

भीड़ में रूबरू हो ही नहीं पाते 

की रुखसती का वक़्त आ जाता 

इस आने जाने के 

मुसाफिर बनने के बीच 

मन करता 

यहीं कहीं बड़ा सा 

बरगद का पेड़ बन जाऊँ 

ढेर सारे परिंदे जमा हो 

और उनको मैं अपने 

जज़्बातों को सुनाऊँ...

Saturday, 13 July 2024

शब्द

तुम भी वहाँ मौजूद नहीं थे 

मेरा तो खैर सवाल ही नहीं उठता 

पर हमारे ख्याल वहाँ मौजूद थे 

पर हमने कभी ज़िरह की 

ये सवाल ही नहीं उठता

हमारे मौन को शब्द मिले थे

पर शब्द तुम्हारी आवाज़ से गूंजे

सवाल ही नहीं उठता

मेरे तो मौन रहने के फैसले थे 

हर एक ने नई कहानी बनाने के 

जिम्मे बहुत लिए थे 

हमें कहानी का किरदार 

बनाने का सवाल ही नहीं उठता 

मौन में उपजे लम्हे 

बेड़ियों से आज़माइश में डालते थे 

बहुत वक़्त था पर सब 

उड़ता जा रहा था तूफ़ान सा 

धीरे धीरे मौन भी खत्म हो गया 

आँधियों को ज़िन्दगी के फैसले 

उड़ा ले जाने की चाहत बहुत थी 

उजड़ा उजड़ा सा सब बिखरा हुआ 

मेरे चीखने से शब्द भी बने 

आवाज़ भी हुई 

दीवारों से टकराई फिर मुड़कर 

मुझ तक वापस आई 

नई नई दीवारें बनती थी हर लम्हा 

मेरी नज़रों के सामने 

सोने चाँदी हीरे मोती की 

पर मजबूत पत्थर सी 

शब्द भूल गई अर्थ भूल गई 

बस धुंधला सा अक्स है 

और दो आंसू हैं 

जिस दिन आँखों को 

दिखना बंद हो जाएगा 

वो मोती गालों पर लुड़क कर 

मौन को शब्द देंगे 

और स्टेज से 

ज़िन्दगी के नाटक का अंतिम दृश्य होगा  

Monday, 23 November 2015

उम्मीद की इबारत


सारी जिंदगी ढूँढती रही
न मंजिल मिली न किनारा 
न शब्दों का अर्थ  
अनवरत चलते कदम 
कभी थकते हैं कभी रुकते हैं 
बस झुकना,
वो कमबख़्त वक़्त भी
नहीं सिखा पाया 
ये उम्मीद शब्द 
मैने सुना जरूर है 
मेरी कलम उसे
बहुत अच्छे से लिख लेती है
पर मेरा मस्तिष्क उसका अर्थ
ढूँढ पाने में बहुत असमर्थ है
क्योंकि उसका अर्थ 
जो तुम बता गए थे
उस तरह का मिलता ही नहीं 
न जाने कौन लिखता है
तकदीर की इबारत
क्यों वो सामने आता ही नहीं 
वर्ना जिंदगी में 
इस पार या उस पार 
कहीं तो अपना अर्थ लिए 
मुझे उम्मीद मिलती 

Sunday, 4 October 2015

पत्थर बोलते नहीं


जब तुम गए मैने देख़ा ही नहीं 
क्या -क्या अपने साथ ले गए
अब मेरा बहुत सा सामान नहीं मिला रहा 
ज़्यादा कुछ नहीं बस दो चार चीज़े हैं 
मैने तुम्हें हर उस जगह पर तलाशा जहाँ तुम हो सकते थे
एक मेरा विश्वास; एक मेरी परछाई
मेरी अंतर आत्मा; मेरे शब्द 
पर तुम कहीं नहीं मिले 
मेरा सामान तो लौटा जाते 
इस बिख़रि हुइ जिंदगी को समेटने के लिए
जो तुम ले गए वो विश्वास चाहिए 
इस जीवन के कोरे कागज को 
लिख़ने के लिए वहीं शब्द चाहिए 
मेरी अंतर आत्मा बहुत ख़ामोश है
उसका मौन तोड़ने के लिए वार्तालाप का प्रहार चाहिए 
मुझे तो नहीं पर हाँ मेरी परछाइँ को आदत थी
तुम्हारे साए से रूठने और मनाने की  
उस परछाइँ को हो सकता है इतंज़ार हो 
कह दो कि तुम मेरा सामान तो लौटाने आओगे एक बार 
इंतज़ार करती आँख़ें पथरा जरूर गई हैं
पर अब ये तुम्हें नहीं रोकेंगी रोड़ा बन 
क्योंकि पत्थर बोलते नहीं