वो ख़ामोशी बचपन में
हॉस्टल की
मेरे अंदर धीरे धीरे
घर करने लगी थी
शब्द जुबां पर कम
ज़ेहन में ज़्यादा
जमा होने लगे थे
कलम कागज़ की
किल्लतें हो चली थी
स्याही की दवातों के
अम्बार भरभराने लगे थे
कमरा टेबल और मैं
शब्दों से भरे
कागज़ों का ढेर
बचपन के साथ साथ
बढ़ते गए भावनाओं के चिनार
चन्द दिनों भीड़ में
गुज़ारने के बाद
वापस खामोशी की ओर
रुख करना
भीड़ में रूबरू हो ही नहीं पाते
की रुखसती का वक़्त आ जाता
इस आने जाने के
मुसाफिर बनने के बीच
मन करता
यहीं कहीं बड़ा सा
बरगद का पेड़ बन जाऊँ
ढेर सारे परिंदे जमा हो
और उनको मैं अपने
जज़्बातों को सुनाऊँ...
