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Tuesday, 26 May 2026

बचपन हॉस्टल घर

वो ख़ामोशी बचपन में 

हॉस्टल की 

मेरे अंदर धीरे धीरे 

घर करने लगी थी 

शब्द जुबां पर कम 

ज़ेहन में ज़्यादा 

जमा होने लगे थे 

कलम कागज़ की 

किल्लतें हो चली थी 

स्याही की दवातों के 

अम्बार भरभराने लगे थे 

कमरा टेबल और मैं 

शब्दों से भरे

कागज़ों का ढेर 

बचपन के साथ साथ 

बढ़ते गए भावनाओं के चिनार 

चन्द दिनों भीड़ में 

गुज़ारने के बाद

वापस खामोशी की ओर 

रुख करना 

भीड़ में रूबरू हो ही नहीं पाते 

की रुखसती का वक़्त आ जाता 

इस आने जाने के 

मुसाफिर बनने के बीच 

मन करता 

यहीं कहीं बड़ा सा 

बरगद का पेड़ बन जाऊँ 

ढेर सारे परिंदे जमा हो 

और उनको मैं अपने 

जज़्बातों को सुनाऊँ...