Showing posts with label ख़ामोश. Show all posts
Showing posts with label ख़ामोश. Show all posts

Sunday, 4 October 2015

पत्थर बोलते नहीं


जब तुम गए मैने देख़ा ही नहीं 
क्या -क्या अपने साथ ले गए
अब मेरा बहुत सा सामान नहीं मिला रहा 
ज़्यादा कुछ नहीं बस दो चार चीज़े हैं 
मैने तुम्हें हर उस जगह पर तलाशा जहाँ तुम हो सकते थे
एक मेरा विश्वास; एक मेरी परछाई
मेरी अंतर आत्मा; मेरे शब्द 
पर तुम कहीं नहीं मिले 
मेरा सामान तो लौटा जाते 
इस बिख़रि हुइ जिंदगी को समेटने के लिए
जो तुम ले गए वो विश्वास चाहिए 
इस जीवन के कोरे कागज को 
लिख़ने के लिए वहीं शब्द चाहिए 
मेरी अंतर आत्मा बहुत ख़ामोश है
उसका मौन तोड़ने के लिए वार्तालाप का प्रहार चाहिए 
मुझे तो नहीं पर हाँ मेरी परछाइँ को आदत थी
तुम्हारे साए से रूठने और मनाने की  
उस परछाइँ को हो सकता है इतंज़ार हो 
कह दो कि तुम मेरा सामान तो लौटाने आओगे एक बार 
इंतज़ार करती आँख़ें पथरा जरूर गई हैं
पर अब ये तुम्हें नहीं रोकेंगी रोड़ा बन 
क्योंकि पत्थर बोलते नहीं

Sunday, 30 August 2015

दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से



दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से 
सुन कर लोग फ़ेर लेते हैं चेहरे 
इन अफ़सानों से 
जो निरंतर चले जा रहे हैं
किस्मत की अंधेरी बंद गलियों  में 
उन्हें देख़ते हैं शरीफ़ लोग 
ख़िडकियाँ बंद कर मकानों से 
दर्द की दवाएँ लिख़ी हैं कुर्सी के विज्ञापन में 
ख़ूबसूरत वादे
टंगे हैं खजूर के पेड़ में 
चीथड़ों में लिपटी बेबस जिंदगियाँ
आशाओं से भरी आँख़ें, ख़ामोश चेहरे 
भीड़ है वृक्ष के नीचे,अमृत की तलाश में 
अंधेरी है इनकी सुबह उदास है शाम 
और हम जो अपने से ही हैं बेख़बर 
हमारी तरफ़ ही है उनकी नज़र 
शीशे में तैरता अट्टहास 
या दर्द में ख़िलती मुस्कान
हमें न जाने कब होगी उनकी पहचान
अब और नहीं बहलेगा उनका मन 
ख़ालि पेट और सूनी आंख़ो में 
दिख़ते हैं मख़मलि सपनें
एक फटा हुआ बिछौना
मुट्ठी भर चावल के दानें 
धूप और बारिश से बचाता एक टूटा आशियाना 
बुझता हुआ सा एक चिराग़
जीवन बीत रहा लड़ता हुआ 
अज्ञान के वीरानों से 
दर्द रिस्ता है
मोम की चट्टानें से

Tuesday, 14 July 2015

कीमती मोती



आज मैने आँसू की एक बूंद में 
बहुत सारे अक्श हैं देखे
वो तेरी मेरी उसकी आँख का पानी
सबकी अलग है कहानी
बचपन के मासूम मोती 
जब आँखों में भर आएँ
माँ कुछ देर भी गर
आँखों से ओझल हो जाए
किशोरों की आँखें
अचानक से कब भर आएँ
व्याकुल मन का पंछी
पिंजरा तोड़ने को झटपटाए
युवा मन और ख़ामोश सिसकियाँ
एकांत में घंटों भिगोते सिरहाने
नाकामि, विरह, त्याग
अनगिनत कहानियाँ 
एक प्रोढ़ आँखों के आँसू
बेटा चला गया विदेश
बेटी को बिदा किया परदेस
बड़े दिनों के बाद उनकी आती है जब चिठ्ठी
रुला जाते हैं उनके न आने के कारण
एक वृद्ध की आँख़ों के आँसू
सिर्फ आँसू ही आँसू
फर्श पर बेटे की मौत बिख़रि पड़ी
उसकी किरचें आँखों में है गढ़ी
औलाद का गम, जिसकी थी जीने की उम्र
कहीं जीवनसाथी अलविदा कह गया
अकेलेपन की सज़ा दे गया
इस उम्र का आँसू
जो सूखता भी नहीं
रुकता भी नहीं
और बहता भी नहीं