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Tuesday, 26 December 2017

कुछ पंक्तियाँ



ऐ ज़िन्दगी तू 
इतना क्यों रुलाती है मुझे 
ये आँखे है मेरी 
कोई समंदर या दरिया नहीं 

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गुज़रे हुए कल 
मैंने तो हद कर दी 
वक़्त से ही वक़्त की 
शिकायत कर दी 

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मेरी मुस्कान गिरवी 
रखी थी जहाँ
वो सौदागर ही न जाने 
कहाँ गुम हो गया
न तो मेरी चीज़ लौटाई
न ब्याज़ बताया

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तुमने मुझ पर दोस्ती के हक
अदा न करने के सौ इल्ज़ाम लगाए
पर एक भी इल्ज़ाम को 
तुम साबित नहीं कर पाए

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काश मुश्किलें एक दिन 
मुझसे कहें की 
आज मैं तेरे आशियाने 
का पता - ठिकाना ही भूल गयी 

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माँ है वो तेरी
कोई चट्टान नहीं
वो अल्फ़ाज़ मत लौटा उसे 
जो उसने तुझे कभी
 सिखाये ही नहीं 

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तुमने कभी कुछ बोला ही नहीं 
की रास्ते में दोबारा 
मुलाक़ात होगी की नहीं 
और मैं खामखां 
इंतज़ार शब्द को 
अपनी वसियत लिख बैठी 

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आज हवाओं में बहुत शोर है 
लगता है गली में 
खुशियाँ बेचने वाला 
सौदागर आया है | 

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Sunday, 30 August 2015

दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से



दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से 
सुन कर लोग फ़ेर लेते हैं चेहरे 
इन अफ़सानों से 
जो निरंतर चले जा रहे हैं
किस्मत की अंधेरी बंद गलियों  में 
उन्हें देख़ते हैं शरीफ़ लोग 
ख़िडकियाँ बंद कर मकानों से 
दर्द की दवाएँ लिख़ी हैं कुर्सी के विज्ञापन में 
ख़ूबसूरत वादे
टंगे हैं खजूर के पेड़ में 
चीथड़ों में लिपटी बेबस जिंदगियाँ
आशाओं से भरी आँख़ें, ख़ामोश चेहरे 
भीड़ है वृक्ष के नीचे,अमृत की तलाश में 
अंधेरी है इनकी सुबह उदास है शाम 
और हम जो अपने से ही हैं बेख़बर 
हमारी तरफ़ ही है उनकी नज़र 
शीशे में तैरता अट्टहास 
या दर्द में ख़िलती मुस्कान
हमें न जाने कब होगी उनकी पहचान
अब और नहीं बहलेगा उनका मन 
ख़ालि पेट और सूनी आंख़ो में 
दिख़ते हैं मख़मलि सपनें
एक फटा हुआ बिछौना
मुट्ठी भर चावल के दानें 
धूप और बारिश से बचाता एक टूटा आशियाना 
बुझता हुआ सा एक चिराग़
जीवन बीत रहा लड़ता हुआ 
अज्ञान के वीरानों से 
दर्द रिस्ता है
मोम की चट्टानें से