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Sunday, 13 February 2022

जाड़े की रातें, किस्मत की बातें


 जाड़ों की सर्द रातें 

कॉफी के मग 

फायर प्लेस की लपटें 

महंगे कंबलों की गर्माइश 

कल के भविष्य की चिंता में 

नींद की तरसती आँखों 

का ख्वाब 

काश एक नींद का 

टुकड़ा मिल जाता 

एक सर्द रात में 

जीवन के दो बिखरे हुए हालात 

पटरी पर सोती 

पतले कम्बलों में 

ठिठुरती ज़िन्दगी 

बिछावन की जगह आज का अखबार 

जिसकी हैडलाइन है,

"आज वर्ष का सबसे ठंडा दिन है"

आधे फटे कम्बल में 

चिपटा हुआ 

गली का आवारा कुत्ता 

ठंडी और राख हो चुकी 

खोखे वाली लकड़ी की आग 

दिन भर की मज़दूरी के बीच 

नींद बहुत गहरी है 

आज में जीता 

आज पेट भरा है 

कल मेरा वजूद 

ज़िंदा है या मरा 

किसी को शायद 

फर्क नहीं पड़ेगा 

पर नींद के ख्यालों में 

एक ख्वाब है कहीं 

काश एक और

कम्बल का टुकड़ा मिल जाता 

ये जाड़े की रातें 

बड़ी अजीब हैं ये 

किस्मत की बातें 



Thursday, 31 December 2015

मुखौटों का शहर


तुम इतना तेज मत चलो 
इतने आगे निकल तो गए हो 
पर कम से कम पल दो पल तो रुको 
रुख कर चलने के बीच 
इतना वक्त तो हो मेरे मीत
इंतज़ार जो तुमने किया हो मेरे लिए 
उसका मुझे अहसास तो हो 
मेरे प्यार में इतना हो दम 
मेरे इंतज़ार में थम जाए तुम्हारे कदम 
तुम्हारी आगे बढ़ने की चाह 
बदल देगी हमारी राह 
बहुत ऊँचाई तक तुम पहुंच गए हो
अगर तुम मुझे हाथ बढ़ा कर थामते
मैं भी उन उचांइयो को महसूस करती 
अब खत्म सी हो रही है कदमों की समानता 
हाथ की ठंडक से पता चल रही है 
रिश्तों की गर्माहट 
सुनहरे सपनों में उलझ कर बहुत दूर निकल गए 
बीच में वक्त के थफेड़ों ने
मिटादी पुरानी यादों की कहानी
आख़रि पड़ाओं पर 
हमारी मुलाकात वास्तविक नहीं थी 
बातों और मुलाक़ातों से ही समझा 
की आगे यात्रा
मिटा देगी मेरा अस्तित्व, क्योंकि?
अब तुम मुखौटों के शहर में
जो आ गए हो 
जहां कदम कभी थकते नहीं 
एक दूसरे का पीछे छोड़ने की चाह में 
सांस लेने को भी लोग रुकते नहीं

Sunday, 30 August 2015

दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से



दर्द रिस्ता है मोम की चट्टानों से 
सुन कर लोग फ़ेर लेते हैं चेहरे 
इन अफ़सानों से 
जो निरंतर चले जा रहे हैं
किस्मत की अंधेरी बंद गलियों  में 
उन्हें देख़ते हैं शरीफ़ लोग 
ख़िडकियाँ बंद कर मकानों से 
दर्द की दवाएँ लिख़ी हैं कुर्सी के विज्ञापन में 
ख़ूबसूरत वादे
टंगे हैं खजूर के पेड़ में 
चीथड़ों में लिपटी बेबस जिंदगियाँ
आशाओं से भरी आँख़ें, ख़ामोश चेहरे 
भीड़ है वृक्ष के नीचे,अमृत की तलाश में 
अंधेरी है इनकी सुबह उदास है शाम 
और हम जो अपने से ही हैं बेख़बर 
हमारी तरफ़ ही है उनकी नज़र 
शीशे में तैरता अट्टहास 
या दर्द में ख़िलती मुस्कान
हमें न जाने कब होगी उनकी पहचान
अब और नहीं बहलेगा उनका मन 
ख़ालि पेट और सूनी आंख़ो में 
दिख़ते हैं मख़मलि सपनें
एक फटा हुआ बिछौना
मुट्ठी भर चावल के दानें 
धूप और बारिश से बचाता एक टूटा आशियाना 
बुझता हुआ सा एक चिराग़
जीवन बीत रहा लड़ता हुआ 
अज्ञान के वीरानों से 
दर्द रिस्ता है
मोम की चट्टानें से