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Saturday, 21 October 2023

आओ मौसम की पहली बारिश में ज़िंदगी ढूँढे


 पिछली बारिश के जमा पलों की गुल्लक खोलें 
उसमें थे बंद कुछ पल रजनीगंधा से महके हुए 
कुछ पल सिलाइयों से उधड़े हुए 
कुछ पल जो हमने वक़्त से थे चुराए भीगे से 
पहली बारिश की नम मिट्टी से सौंधे अल्फ़ाज़ 
आँगन के गड्ढों में जमा हुआ पानी 
काग़ज़ की नाव बनाकर
ख़ुशियों से मुस्कुराते चेहरे 
सीली हुईं लकड़ी से उठता हुआ धुआँ 
चाय में घुला हुआ 
धुएँ के इस पार वजूद है 
उस पार बस एक ख़लिश है 
पहली बारिश में 
ज़िंदगी ढूंढता हर शख़्स 
आओ पहली बारिश में ज़िंदगी ढूंढें ...  

Monday, 29 March 2021

धूप सुनहरी तेरे आँगन की


तेरे आँगन की धूप सुनहरी चमकीली 

मेरे घर की मसाले वाली चाय अदरक की 

बस दो छोटे से बहाने थे 

गुलाबी ठण्ड बिताने के 

धूप की चमक आँखों में 

बातों का सिलसिला किताबों में 

मासूम सी मुलाक़ात 

बहुत जल्दी में 

ढलती वो चटकीली धूप 

मलाल तो रहता है 

घाटियों सी उदासियाँ 

कल की धूप बहुत कुछ 

पार करके आएगी 

बादलों को भी तो

कभी कभी 

कुछ काम नहीं होता 

बेमौसम बरस कर 

सूरज को छिपा आते हैं कहीं 

काश सूरज तेरे घर के 

काँच के जार में 

बंद रहता 

बनी रहती धूप सुनहरी 

तेरे आँगन की 

और अदरक वाली चाय 

मेरे घर की