Monday, 29 March 2021

धूप सुनहरी तेरे आँगन की


तेरे आँगन की धूप सुनहरी चमकीली 

मेरे घर की मसाले वाली चाय अदरक की 

बस दो छोटे से बहाने थे 

गुलाबी ठण्ड बिताने के 

धूप की चमक आँखों में 

बातों का सिलसिला किताबों में 

मासूम सी मुलाक़ात 

बहुत जल्दी में 

ढलती वो चटकीली धूप 

मलाल तो रहता है 

घाटियों सी उदासियाँ 

कल की धूप बहुत कुछ 

पार करके आएगी 

बादलों को भी तो

कभी कभी 

कुछ काम नहीं होता 

बेमौसम बरस कर 

सूरज को छिपा आते हैं कहीं 

काश सूरज तेरे घर के 

काँच के जार में 

बंद रहता 

बनी रहती धूप सुनहरी 

तेरे आँगन की 

और अदरक वाली चाय 

मेरे घर की 



31 comments:

  1. वाह, सुंदर भावाभिव्यक्ति

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय ।

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  2. वाकई अदरक वाली चाय सुनहरी धुप में पी जाए तो बात ही क्या ... बहुत सुन्दर

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    1. संगीता जी जब आप जैसे बड़े लेखकों की प्रशंसा मिलती हैं तो मै अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानती हूँ, बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीया ।

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  3. बहुत बहुत सुन्दर

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीय सर ।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (31-03-2021) को  "होली अब हो ली हुई"  (चर्चा अंक-4022)   पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। परन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि ब्लॉग अब भी लिखे जा रहे हैं और नये ब्लॉगों का सृजन भी हो रहा है।आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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    1. आदरणीय सर नमस्कार,मेरी रचना को चर्चा अंक में स्थान देने पर तहेदिल से शुक्रिया आपका ।

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  5. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 30 मार्च 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. आदरणीया मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में स्थान देने पर तहेदिल से शुक्रिया आपका,

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  6. काश!काँच के ज़ार में बंद रख पाती कुछ
    खूबसूरत पल और सुनहरे समय की.मखमली लच्छियाँ।

    बहुत सुंदर भावाव्यक्ति प्रिय मधुलिका जी।
    सस्नेह
    सादर।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका श्वेता जी,बडा ही ख़ूबसूरत सा शब्द आपने लिखा है,मखमली लच्छियाँ,स्नेह एंव शुभकामनाएँ ।

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  7. तेरे आँगन की धूप सुनहरी चमकीली
    ...बहाने थे
    बेहद खूबसूरत तरीके से लिखी गई ये पंक्तियाँ मन को भा गई। ।। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीया।।।

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीय सर ।

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  8. वाह मधूल‍िका जी बहुत द‍िनों बाद पढ़ने को म‍िला...अद्भुत ल‍िखा ''बनी रहती धूप सुनहरी

    तेरे आँगन की

    और अदरक वाली चाय

    मेरे घर की '' वाह

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    1. आदरणीय सर बहुत बहुत शुक्रिया आपका हौसलाअफ़जाई के लिए,ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  9. मोहक अभिव्यक्ति अनुराग समेटे हृदय में।

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आपका आदरणीया ।

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  10. घर आँगन की कई छोटी छोटी यादें एक दूजे के आँगन में न आयें तो यादें खान बनती हैं ... इन्ही के सहारे जीवन भी चलता है ...

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    1. आदरणीय सर बहुत बहुत शुक्रिया,मै सौभाग्यशाली हूं आप की हौसलाअफ़जाई मेरी रचनाओं को मिलती है, आदरणीय शुभकामनाएँ ।

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  11. क्या खुशबू है .. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीया ।

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय।

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  13. बहुत कुछ कहने का जी कर रहा है इस कविता को पढ़कर लेकिन फ़िलहाल यही कहना है कि यह बहुत अच्छी लगी मुझे ।

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  14. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय।

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  15. ठंडा दिसंबर,
    सुनहरी धूप
    और अदरक वाली चाय...मानो जैसे इश्क़ मुकम्मल हो गया..

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय।

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