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Saturday, 30 March 2024

मेरा स्वाभिमान



तुम मुझे देखना चाहते हो 
मदारी के बंदर की तरह 
कितना हसीन ख़्बाव है तुम्हारा,
मेरा तुम पर ऐतमाद
की जहां मुझे लगे की
कदमों तले ज़मीन नहीं है,
वहाँ मुझे तुम्हारे हाथों की 
मज़बूती का अहसास हो...
पर तुम्हारे हाथों की मज़बूती में 
कठपुतली वाली डोर फँसी हुई है 
जिसके धागे मुझ तक आते हैं
और मुझे उलझा जाते हैं 
ताकि मैं चलती रहूँ 
नागफनी के सुंदर काँटों पर 
सबसे अहम मेरे अहंकार की डोर को भी 
तुम तोड़ देना चाहते हो ,पर
वो मेरा ग़ुरूर, मेरा फहम
 नहीं बन सकते तुम्हारे गुलाम
हालातो के हाथों की 
मै कठपुतली ज़रूर हूँ पर
मेरे अंदर का स्वाभिमान जब तक ज़िंदा है 
हर उल्झी हुई डोर 
मुझे नाचने पर मजबूर 
ज़रूर कर सकती है 
पर मेरे स्वाभिमान को नहीं । 

~

ऐतमाद ~ विश्वास
फहम ~ दिमाग़

Wednesday, 6 April 2016

रोटी


ऊँचा पद बढ़ता रौब
कुर्सी का रुतबा
अधिनस्तोकी फ़ौज
जोड़ते हाथ विनती के
घुटता दम मरता स्वाभिमान
आस और उम्मीद
किस चीज की
पेट की आग बुझाने वाली
बरसात रोटी और पैसा
बहुत नीचे खड़ा है वो
पता नहीं दिखेगा भी की नहीं
उसकी विनती और लाचारी वाला कद
बहुत ही न्यून है
कुर्सी से उसे उम्मीद बहुत है
दोनों हाथो को जोड़ते वक्त
अपने स्वाभिमान को
पैरो तले रौंदता हुआ पाता है
सब कुछ समेट लेता है
गाँव परिवार झोपड़ी
जिम्मेदारी बीमारी
उन्हीं दो हाथों में उसकी विनती के अंदर
चार पैसों की आस वाली नौकरी
कुर्सी की आँखें बहुत घाघ हैं
वो देखना चाहती हैं की कितना कुछ खून
निचोड़ा जा सकता है
चंद पैसों के बदले