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Wednesday, 12 January 2022

मेरी आवाज़ खो सी गइ है कहीं


 ज़माने की रौनक में 

ज़िन्दगी ढूंढने का मसला 

रफ़्तार के बीच 

कहीं पीछे छूट जाने का डर 

पहचान को बरक़रार 

रखने की जद्दोजहत 

हुज़ूम के बीच की ज़िन्दगी 

जहाँ तिल भर भी हिलने की 

जगह न हो 

कभी कभी भ्रम होता है 

जीवन को सांसे 

मिल भी रही है की नहीं 

कोई खेल रहा है 

तुम्हारे साथ 

ताश की बाज़ी 

कौन सा पत्ता अब 

टेबल पर पड़ने वाला है 

बढ़ता टेंशन का लेवल 

मेरी आवाज़ मुझमें ही 

खो सी गइ है कहीं 

दुनिया के बाज़ार में

शब्द सब खर्च हो गए हैं 

जीने के लिए अगले 

दिन में ढकेल दिए 

जाते हो 

इतनी रफ़्तार में 

दोस्त और दुश्मन

दोनों को समझ पाना 

बड़ा मुश्किल है

प्यार और नफरत 

सिक्के के दो पहलु

पर सिक्का अब

घूमता ही रहता है

बहुत तेज़ी से 

जिससे की तुम 

कुछ महसूस ही 

नहीं कर पाओ 

जब दूभर हो जाता है 

इन सब के बीच जीना 

तब अकेले निकल पड़ना 

लॉन्ग ड्राइव के लिए 

सन्नाटे की खोज में 

जहाँ अपनी आवाज़ 

लौटकर खुद अपने 

को सुनाई दे 


Wednesday, 3 April 2019

तुम्हारा उपहार



कभी फादर्स डे कभी मदर्स डे
हर साल आते हैं 
सब कुछ मिलता है 
बाज़ारों में उपहारों के लिए 
पर नहीं मिलता तो वो वादों के शब्द
जो चाहिए होते हैं हर माता - पिता को 
क्योंकि वो दुकानों में नहीं दिलों में बिकते हैं 
और एक आश्वासन और विश्वास की
नज़रों के नर्म गिफ्ट पेपर से लिपटे हों अहसास
की हाँ हम होंगे
जब आपको ज़रूरत होगी 

तुम होना तब
जब हम बच्चे बन जाएँ
और तुम हमारे अभिभावक 
वही ममता वही धैर्य
वही प्यार वही अहसास
लौटाने की बारी हो
अर्थ परिस्तिथियाँ 
समय सब बदलती हैं 
न बदलना तुम 
जब तुम्हारी बारी आए
अभिभावक बनने की 
जब हम बच्चे बन
मांगे मन चाहा खाना 
और कांपते हाथों से 
गिरा लें अपने ऊपर 
और टूट जाए महंगी प्लेट 
क्या तुम हमे दोबारा खिलाने तक 
धैर्य को मुट्ठी में बांधे रखोगे 
जब अल्ज़ाइमर से घिर जाएँ 
भूल कर बार बार एक ही बात दोहराएँ  
तुम्हारे पास हमे बहलाने के लिए 
चंद लम्हे तो होंगे न
वो उम्र दराज़ होती नींद 
आँखों से गायब होती जाती
क्या तुम हमारे साथ जागोगे
अब वक़्त बदला जो है
अब हालातों की परीक्षा हमारी है 
परिणाम की चिंता तुम्हे 
तुम्हारे हर इम्तेहान में जाग कर 
सफलता की सीढ़ियों तक छोड़ आए हैं 
हमारे कदम लड़खड़ाएंगे और 
काया होगी कमज़ोर 
क्या तुम सहारा दोगे 
रुक रुक कर चल सकोगे
जैसे हम तुम्हे हाथ पकड़ कर 
चलना सिखाया करते थे 
हमारी आँखों की होगी जब 
रौशनी कम
क्या तुम हमें पढ़कर 
सुनाया करोगे
नहीं हम तुम्हारी तरह 
परियों वाली कहानी 
सुनने की ज़िद नहीं करेंगे 
बस डॉक्टर की दवा 
कितनी दफे खानी है 
इतना ही पढ़ देना 
तुम्हे हैरान नहीं करना है 
बस हर मदर्स डे और फादर्स डे पर 
एक वादा दे दिया करो 
बस इतना सा उपहार काफी है 
हमारा हाथ पकड़ कर विशवास से 
तुम्हारा हाँ कहना ही 
सब उपहार पर भारी है . . . 

Thursday, 28 January 2016

मेरी ज़िम्मेदारी


वो माँ का झूठ मूठ में पतीला खनकाना 
सब भरपेट खाओ बहुत है खाना 
फटी हुइ साड़ी को शाल से ढक लिया 
मेरी फीस का सारा जिम्मा अपने सिर कर लिया 
रात में ठंड से काँपती रहे
और मुझे दो-दो दुशालें से ढांपती रहे 
मैं बरस दर बरस बढ़ता गया 
मेरी भावनाओं, ख़यालातों का दायरा घटता गया 
मैंने तुझसे दूर जा कर 
सिक्कों का महल बनाया 
वक्त को मोहरा बना कर 
तरक्की के सारे दरवाज़ों को खोलता गया 
पर तेरी ओर जाने वाले दरवाजे को खोलना ही भूल गया 
दूर रहकर भी तू पूछती 
तेरी आवाज़ कुछ सर्द है
क्या जीवन में कुछ कमी या कोइ दर्द है 
माँ तेरी बीमारी, लाचारी 
डाक्टर और दवा का इतंज़ार 
धंसती आँखें बंया कर रही थी
जर-जर होते शरीर की कहानी बार-बार 
पिता का काँपते हाथों से 
पुरानी दराज़ में पैसे टटोलना 
अनुभवी आँखों का सही अंदाज़ा
पर कुछ ना बोलना 
बेबसी और लड़खड़ाते कदम
आखिरी सांस और
अनंत आशिर्वाद और प्यार का संगम
ईश्वर मेरे बेटे को हमेशा ख़ुश रख़ना
उसके हिस्से के दुख़ दर्द मेरे सिर करना 
माँ तुझे मेरे प्यार और सहारे की चाहत
जाने क्यों नहीं दी मैंने उन्हें राहत

Thursday, 17 December 2015

माँ का इंतज़ार


माँ मुझे आज भी तेरा इंतज़ार है 
पता नही क्यों ?
तू आती है मिल्ती है और 
प्यार भी बहुत करती है 
तुझे मेरी फिक्र भी है 
पर मुझे तेरा इतंज़ार है 
कल कोइ मुझसे पूछ रहा था 
अरे पागल कैसा तेरा ये इतंज़ार है
मैं तुम्हें नहीं बता सकती
बात बरसों पुरानी है 
वो मेरा नन्हा सा मन 
सालों बाद भी; मेरे अंदर 
छुप कर बैठा है 
और सवाल करता है 
अपने आप से बार-बार  
वो सवाल आँखों में 
छुप गया है आँसू बना
होठों पर आते-आते रुक गया है
कुछ मन में फाँस बन चुभ गया है 
तूने मुझे अपने से अलग कर कहा था 
मैं यहाँ खुश रहूंगी 
और तू मुझसे मिलने 
आया करेगी कभी-कभी 
वो कभी-कभी शब्द 
मेरे मन से कभी नहीं निकला 
वो तेरा कहना आया करूँगी 
मेरे लिए इतंज़ार शब्द बन गया 
और वो बचपन का इतंज़ार 
मेरे अदंर डर बना कर ऐसे छुप गया कि
वो कभी ख़ुली हवा में निकला ही नहीं 
और वो इंतज़ार शब्द 
अपाहिज हो गया 
अब वो चल नहीं सकता है 
इसलिए मेरे अंदर से निकल नहीं पाता है ।

चित्र गूगल के माध्यम से 

Friday, 24 July 2015

तुम्हारा प्यारा सा नाम


तुम आती हो नए घर संसार में 
सपने हजारों हैं अपनों के प्यार में 
सुबह मंदिर की प्रार्थना में 
औरों का दुख दर्द
मांगती अपने हिस्से में 
सबको खिलाने के बाद 
आधे पेट खाने से ही हो जाती तृप्त
तुम्हारा पसीना है टपकता 
सारा आशियाना है चमकता
रसोइ का धुअाँ बहुत गहरा
तुम्हारा अस्तित्व नहीं कुछ कह रहा
घर के अंदर से बाहर तक 
उसी के कंधे पर है टिकी
घर की एक -एक मंयार
तुम खो गई उस घर में
पर जब घर के द्वार पर दस्तक होती है  
हर कोइ पूछता है 
दरवाज़े पर लगी नेम-प्लेट वाले शख्स को 
तुम्हारा नाम उस घर में कहीं गुम गया है
तुम्हें तो रिश्ते आपना नाम दे चुके हैं
पत्नी, बहू, माँ और भाभी का
कब वक्त आएगा कि लिखा हो 
घर के बाहर तुम्हारी पहचान के साथ
तुम्हारा प्यारा सा नाम

Saturday, 18 July 2015

केसी ये तेरी रज़ा



तूने कभी मुझे चाहा ही नहीं
पर तूने मुझे प्यार के भ्रमजाल में भरमाया तो सही
तेरी बातें कच्चे रंग सी धुल के निकली
तेरे वादे बिन पानी वाले बादलों से हल्के निकले 
सच्चे प्यार में तूने वफ़ा की आजमाइश की 
और तूने बेवफ़ाइ की हद पार की 
मैने तो अख़िरि सांस तक किया तेरा इतंजार
पर तूने तोड़ डाली मेरी आस की पतवार
प्रेम की परिभाषा पढ़ने के तेरे तरीके कभी थे ही नहीं सही
पर तूने मेरे मरने पर झूठा मातम मनाया तो सही
तू मेरी कबर पर आया तो बार-बार 
पर गुलाब में छुपा कर कांटे भी लाया हजार 
केसी ये तेरी रज़ा
देती रही मुझे हर पल सज़ा