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Friday, 24 July 2015

तुम्हारा प्यारा सा नाम


तुम आती हो नए घर संसार में 
सपने हजारों हैं अपनों के प्यार में 
सुबह मंदिर की प्रार्थना में 
औरों का दुख दर्द
मांगती अपने हिस्से में 
सबको खिलाने के बाद 
आधे पेट खाने से ही हो जाती तृप्त
तुम्हारा पसीना है टपकता 
सारा आशियाना है चमकता
रसोइ का धुअाँ बहुत गहरा
तुम्हारा अस्तित्व नहीं कुछ कह रहा
घर के अंदर से बाहर तक 
उसी के कंधे पर है टिकी
घर की एक -एक मंयार
तुम खो गई उस घर में
पर जब घर के द्वार पर दस्तक होती है  
हर कोइ पूछता है 
दरवाज़े पर लगी नेम-प्लेट वाले शख्स को 
तुम्हारा नाम उस घर में कहीं गुम गया है
तुम्हें तो रिश्ते आपना नाम दे चुके हैं
पत्नी, बहू, माँ और भाभी का
कब वक्त आएगा कि लिखा हो 
घर के बाहर तुम्हारी पहचान के साथ
तुम्हारा प्यारा सा नाम

Wednesday, 8 July 2015

कंकड़ सा मैं, मोती सी तुम - मुदित श्रीवास्तव



कंकड़ सा मैं मोती सी तुम 
आकार भले ही समान हो 
प्रकार है लेकिन भिन्न 

कंकड़ मैं बदसूरत 
न चमक न कोई रंग ढंग का 
मोती तुम सफ़ेद झक्क 
है चमक और है ख्याती तुम्हारे अंग का

कंकड़ मैं नाकारा सा 
कही भी मिल जाऊं मुंह उठाकर
मोती तुम उत्कृष्ठ सी 
रख ले हर कोई अंगुल या कंठ में 
मालाओं में पिरोकर, सजाकर 

कंकड़ मैं कठोर सा 
मरा हुआ, निर्जीव 
पैरो में लोगो के तले पड़ा हुआ 
मोती तुम मर्म सी 
प्रिय हो लोगो को 
अस्तित्व है, तुम्हारा 
लोगो की उंगलियो में जड़ा हुआ 

है कैसे संभव मेल 
एक कंकड़ का एक मोती से 
तुम रईसों की ठाठ हो 
और मैं बच्चों का खेल 

- मुदित श्रीवास्तव