सपने हजारों हैं अपनों के प्यार में
सुबह मंदिर की प्रार्थना में
औरों का दुख दर्द
मांगती अपने हिस्से में
सबको खिलाने के बाद
आधे पेट खाने से ही हो जाती तृप्त
तुम्हारा पसीना है टपकता
सारा आशियाना है चमकता
रसोइ का धुअाँ बहुत गहरा
तुम्हारा अस्तित्व नहीं कुछ कह रहा
घर के अंदर से बाहर तक
उसी के कंधे पर है टिकी
घर की एक -एक मंयार
तुम खो गई उस घर में
पर जब घर के द्वार पर दस्तक होती है
हर कोइ पूछता है
दरवाज़े पर लगी नेम-प्लेट वाले शख्स को
तुम्हारा नाम उस घर में कहीं गुम गया है
तुम्हें तो रिश्ते आपना नाम दे चुके हैं
पत्नी, बहू, माँ और भाभी का
कब वक्त आएगा कि लिखा हो
घर के बाहर तुम्हारी पहचान के साथ
तुम्हारा प्यारा सा नाम

