आकार भले ही समान हो
प्रकार है लेकिन भिन्न
कंकड़ मैं बदसूरत
न चमक न कोई रंग ढंग का
मोती तुम सफ़ेद झक्क
है चमक और है ख्याती तुम्हारे अंग का
कंकड़ मैं नाकारा सा
कही भी मिल जाऊं मुंह उठाकर
मोती तुम उत्कृष्ठ सी
रख ले हर कोई अंगुल या कंठ में
मालाओं में पिरोकर, सजाकर
कंकड़ मैं कठोर सा
मरा हुआ, निर्जीव
पैरो में लोगो के तले पड़ा हुआ
मोती तुम मर्म सी
प्रिय हो लोगो को
अस्तित्व है, तुम्हारा
लोगो की उंगलियो में जड़ा हुआ
है कैसे संभव मेल
एक कंकड़ का एक मोती से
तुम रईसों की ठाठ हो
और मैं बच्चों का खेल
- मुदित श्रीवास्तव
