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Sunday, 4 October 2020

पंक्तियाँ.. दिल से



 उसने पेपर पर 

और मैंने माँ के हाथ पर 

कर दिए दस्तखत 

और हमें मिल गयी 

अपने अपने हिस्से की दौलत 

~

हर दिन डरती थी 

तुम्हे खोने से 

पर अब देखो 

जब से तुम गए हो 

ये डर भी खामोशी से 

बिना बताये कहाँ चला गया

पता नहीं 

~

मेरी कब्र की मिट्टी 

आज कुछ नम है 

सुना है आज तू 

मेरी पसंद के 

रजनीगंधा के फूल 

लाने वाला था 

~

बहुत दिन के बाद 

मिल तो रहे हो 

पर मैं तुम्हारे जितना 

दौलतमंद नहीं 

कहीं ऐसा न हो 

चंद लम्हों के बाद 

तुम्हे कुछ 

ज़रूरी काम याद आ जाए 

Wednesday, 3 April 2019

तुम्हारा उपहार



कभी फादर्स डे कभी मदर्स डे
हर साल आते हैं 
सब कुछ मिलता है 
बाज़ारों में उपहारों के लिए 
पर नहीं मिलता तो वो वादों के शब्द
जो चाहिए होते हैं हर माता - पिता को 
क्योंकि वो दुकानों में नहीं दिलों में बिकते हैं 
और एक आश्वासन और विश्वास की
नज़रों के नर्म गिफ्ट पेपर से लिपटे हों अहसास
की हाँ हम होंगे
जब आपको ज़रूरत होगी 

तुम होना तब
जब हम बच्चे बन जाएँ
और तुम हमारे अभिभावक 
वही ममता वही धैर्य
वही प्यार वही अहसास
लौटाने की बारी हो
अर्थ परिस्तिथियाँ 
समय सब बदलती हैं 
न बदलना तुम 
जब तुम्हारी बारी आए
अभिभावक बनने की 
जब हम बच्चे बन
मांगे मन चाहा खाना 
और कांपते हाथों से 
गिरा लें अपने ऊपर 
और टूट जाए महंगी प्लेट 
क्या तुम हमे दोबारा खिलाने तक 
धैर्य को मुट्ठी में बांधे रखोगे 
जब अल्ज़ाइमर से घिर जाएँ 
भूल कर बार बार एक ही बात दोहराएँ  
तुम्हारे पास हमे बहलाने के लिए 
चंद लम्हे तो होंगे न
वो उम्र दराज़ होती नींद 
आँखों से गायब होती जाती
क्या तुम हमारे साथ जागोगे
अब वक़्त बदला जो है
अब हालातों की परीक्षा हमारी है 
परिणाम की चिंता तुम्हे 
तुम्हारे हर इम्तेहान में जाग कर 
सफलता की सीढ़ियों तक छोड़ आए हैं 
हमारे कदम लड़खड़ाएंगे और 
काया होगी कमज़ोर 
क्या तुम सहारा दोगे 
रुक रुक कर चल सकोगे
जैसे हम तुम्हे हाथ पकड़ कर 
चलना सिखाया करते थे 
हमारी आँखों की होगी जब 
रौशनी कम
क्या तुम हमें पढ़कर 
सुनाया करोगे
नहीं हम तुम्हारी तरह 
परियों वाली कहानी 
सुनने की ज़िद नहीं करेंगे 
बस डॉक्टर की दवा 
कितनी दफे खानी है 
इतना ही पढ़ देना 
तुम्हे हैरान नहीं करना है 
बस हर मदर्स डे और फादर्स डे पर 
एक वादा दे दिया करो 
बस इतना सा उपहार काफी है 
हमारा हाथ पकड़ कर विशवास से 
तुम्हारा हाँ कहना ही 
सब उपहार पर भारी है . . . 

Wednesday, 7 December 2016

तुझे खोकर



माँ तुझे खोकर तेरी यादों को पाया है
वो चेहरा जो रोज़ नज़र में था
आज दिल में समाया है
ढलती सेहत ने
तुम्हारी नींद कहीं छुपा दी थी
तुम्हें खोकर आज
सारा घर जाग रहा
तुम्हारी नींद बहुत लंबी है
शांत शरीर में बीमारी की थकान नहीं
चिंताओं की माथे पर
कोई शिकन नहीं
वो जिजीविषा शब्द
तुम्हारे रोम रोम से
फूटता था
ईश्वर की मर्ज़ी या तेरे जाने का बहाना
हर बंधन तूने तोड़ दिया
अब तुझे नहीं है वापस आना
अल्मारी में रखी तेरी साड़ी
उसकी तह उस दिन के बाद से
मैंने नहीं खोली है
कि कहीं उड़ न जाए
वो तेरे अहसास की खुशबू
जो मुझे भ्रमित करती है
कि तू कहीं मेरे
आस पास ही है

Friday, 12 February 2016

ऐ वीर तुझे अनंत नमन


ये कहकर गया था जब अबकी बार आउंगा
माँ गोद में तेरी सर रख कर जी भरकर सोउँगा ।
लाल मेरा तू तो है भारत माता का प्रहरी
इसीलिये नींद तेरी रहती थीं आँखों से ओझल
कभी न वो तेरी पलकों में ठहरी ।
पर माँ का दिल आज अचानक से दरक गया
क्यों आज पूजा का थाल हाथ से सरक गया ।
जहां कहीं मेरे जिगर का टुकड़ा होगा 
आज नहीं तो कल लौटेगा ।
हर नई सुबह 
आस उम्मीद का एक नया दीप जला होगा 
माँ ने याद किया होगा 
बचपन से जवानी तक का सफरनामा ।
पत्नी ने याद किए होंगें 
सारी जिंदगी साथ निभाने के वचन
वो सिदूंर मंगलसूत्र और चूड़ीयों में बसे सुनहरे पल ।
बहुत सी जंग जीती जीवन में 
पर अब वो कौन सी जंग हार गया ।
एक माँ को जिम्मेदारी का आखिरी नमन कर 
दूजी माँ की गोद में सोने को आतुर 
लम्बी नींद को चला गया ।
नहीं डरा वो वीर सपूत
पूरी मुस्तेदी से डटा रहा
अपनी ज़िम्मेदारी को दर्ज करा गया ।

Thursday, 3 December 2015

जब बात सबूतों की चली


तुमने बड़ी खामोशी से लौटाए कदम
पर मेरे दिल पर दस्तक हो ही गई मेरे हमदम 
आते हुए कदमों में एक जोश था
लौटता हुआ हर कदम ख़ामोश था 
वो शिकायतों की गिरह ख़ोल तो देता 
जो तूने अपने मन में बांधी थी
दो लफ़जों में बोल तो देता
नासूर जो तूने बिना वजह पाले
उसकी दवा मुझसे पूछ तो लेता, ओ मतवाले 
चाँद को गवाह बना कर किए थे जो वादे
क्यों भोर होने तक कमज़ोर पड़ गए तेरे इरादे 
तेरी नज़रों का वो धोख़ा था 
वो धुँध में जो साया था 
वो मेरा वजूद था 
वर्षों से मुझमें समाया था 
वो मेरा आत्मसम्मान था 
जो तुझ से टकराया था 
तुम बात सबूतों की मत करो 
कभी अपने गिरहेवांह में भी झाँका करो

Wednesday, 30 September 2015

परिंदे


परिंदे नहीं होते स्वार्थी
ख़ुल कर जीते हैं
आख़िरि सांस तक 
निस्वार्थ भाव से सिख़ाते हैं
अपने बच्चो को उड़ना
ख़ुल जाते हैं जब बच्चो के पंख़ 
नहीं उम्मीद करते की
ये मुड़कर लौटेगा भी की नहीं 
आने वाला कल 
घोंसला ख़ाली होगा की भरा 
कैसे रह पाते होंगें 
उनके अपने जब दूर चले जाते होंगें
उनके आँसू उनका दिल उनका इतंज़ार
क्या वो घोंसले से निकाल फ़ेकते हैं
और उड़ जाते हैं सब कुछ झटक कर
कहीं बहुत दूर बिना यादों के

Wednesday, 13 May 2015

जब दुख था नन्हा पौधा जीवन में


जब दुख था नन्हा पौधा जीवन में 
तब आँखे भर जाती थी बात बात में 

दिल पर लग जाती थी बाते हर रूप में 
तब दिमाग और दिल अलग अलग सोचते 
दिमाग बंद कमरे में था और 
दिल निकल पड़ा था अपनों की खोज में 
दिल नादान था 
बहुत ठोकरे खाता इस भाग दौड़ में 
कुछ नहीं मिला, सब से था उसे गिला 
कुंदन का मर्तबान पर, विष था भरा हुआ 
दिमाग ने दिआ उसे दिलासा 
कहना सुन मेरा ,कोई नहीं है तेरा 
अपनों से प्यार पाने की होड़ में 
लहू हो गए तेरे पैर ,अब पीछा छोड़
आंसू के सागर को सूख जाने दे 
दिमाग को बंद कमरे से बहार आने दे 
अपने दिमाग की सुन कर चल 
दिल से कह ,अब तू न बच्चों की तरह मचल 
दुनिया बहुत ख़राब है 
आसुँओ को बहाना नहीं, पीना सीख 
क्योंकि वही तो तेरे पास रखी शराब है 
इतना नशा है इसमें कि सबका दिया 
दुख डूब जाता है ,
नहीं आता फिर दिमाग होश में ।