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Sunday, 21 June 2020

सरहदों से तुम्हारा आना



सरहदों से तुम्हारा आना
पलाश के फूल की तरह 
वहीँ तो खिलते हैं 
उमीदों की तपती दोपहर में 
तुम आओगे तो न 
बहुत दिनों से कह तो रहे हो 
पर आने के तुम्हारे संदेशों में 
इंतज़ार मुझे हराता नहीं है 
वो ख़त्म होती ख़ुशी को 
रोज़ मैं 
खींच कर, खरोंच कर 
बचा कर 
जी रही हूँ 
फिक्रमंद ज़िन्दगी रोज़ मरती है 
और ये परेशानियों का अब्र 
चाहिए बहुत सारा सब्र 
बड़े शहरों के बड़े वादे 
और तू भी आने की बातों के 
फरेब में जीना सिखा दे 
पीली पत्तियाँ और ये पतझड़ 
इन्ही के बीच 
कहीं न कहीं 
नई कोपलें भी होंगी 
हर कोने में उदासी फ़ैल रही है 
तुम थोड़ा जल्दी आ जाना 
मैंने एक शोख रंग बचा रखा है
उसे हम ख़ुशी में घोल देंगे 
सच कहो तुम 
इंतज़ार की हद के 
गुजरने से पहले तो
आ जाओगे न 

Saturday, 16 June 2018

तुम्हे लड़ना होगा


मीलों दूर तक पसरे हुए ये रास्ते
कभी कभी बोझिल हो जाते हैं कदम 
जाने पहचाने रास्तों को 
देर नहीं लगती अजनबी बनने में 
जब सफर होता है तन्हा
और मंज़िलें होती गुम
रौशनी में नहाये हुए बाज़ार 
रौनकों से सजी हुई दुकाने 
पर मैं कुछ अलहदा 
ढूंढ़ रही हूँ खरीदने के वास्ते 
ढेर सारी खामोशियाँ 
सौदागर बोला
इसका व्यापार नहीं होता
पर मिल जाएगी तो
ला दूंगा 
तुम सजा लेना 
अपने आस - पास 
मेरे मन का हकीम
कभी कभी दिलासा देने
आ जाता है 
खंडहरों के रास्ते से 
की कभी न कभी ढूँढ लाऊंगा
गहरे ज़ख्मों की दवा
क्योंकि अभी तुम युद्ध के मैदान में हो 
और जंग जीतने तक
लड़ना है तुम्हे 
मंझे हुए घुड़सवार यूं ही नहीं
गिरा करते
जीवन के युद्ध में 
पीठ दिखा कर 
हिम्मत हारा नहीं करते 


Friday, 12 February 2016

ऐ वीर तुझे अनंत नमन


ये कहकर गया था जब अबकी बार आउंगा
माँ गोद में तेरी सर रख कर जी भरकर सोउँगा ।
लाल मेरा तू तो है भारत माता का प्रहरी
इसीलिये नींद तेरी रहती थीं आँखों से ओझल
कभी न वो तेरी पलकों में ठहरी ।
पर माँ का दिल आज अचानक से दरक गया
क्यों आज पूजा का थाल हाथ से सरक गया ।
जहां कहीं मेरे जिगर का टुकड़ा होगा 
आज नहीं तो कल लौटेगा ।
हर नई सुबह 
आस उम्मीद का एक नया दीप जला होगा 
माँ ने याद किया होगा 
बचपन से जवानी तक का सफरनामा ।
पत्नी ने याद किए होंगें 
सारी जिंदगी साथ निभाने के वचन
वो सिदूंर मंगलसूत्र और चूड़ीयों में बसे सुनहरे पल ।
बहुत सी जंग जीती जीवन में 
पर अब वो कौन सी जंग हार गया ।
एक माँ को जिम्मेदारी का आखिरी नमन कर 
दूजी माँ की गोद में सोने को आतुर 
लम्बी नींद को चला गया ।
नहीं डरा वो वीर सपूत
पूरी मुस्तेदी से डटा रहा
अपनी ज़िम्मेदारी को दर्ज करा गया ।