Sunday, 21 June 2020

सरहदों से तुम्हारा आना



सरहदों से तुम्हारा आना
पलाश के फूल की तरह 
वहीँ तो खिलते हैं 
उमीदों की तपती दोपहर में 
तुम आओगे तो न 
बहुत दिनों से कह तो रहे हो 
पर आने के तुम्हारे संदेशों में 
इंतज़ार मुझे हराता नहीं है 
वो ख़त्म होती ख़ुशी को 
रोज़ मैं 
खींच कर, खरोंच कर 
बचा कर 
जी रही हूँ 
फिक्रमंद ज़िन्दगी रोज़ मरती है 
और ये परेशानियों का अब्र 
चाहिए बहुत सारा सब्र 
बड़े शहरों के बड़े वादे 
और तू भी आने की बातों के 
फरेब में जीना सिखा दे 
पीली पत्तियाँ और ये पतझड़ 
इन्ही के बीच 
कहीं न कहीं 
नई कोपलें भी होंगी 
हर कोने में उदासी फ़ैल रही है 
तुम थोड़ा जल्दी आ जाना 
मैंने एक शोख रंग बचा रखा है
उसे हम ख़ुशी में घोल देंगे 
सच कहो तुम 
इंतज़ार की हद के 
गुजरने से पहले तो
आ जाओगे न 

35 comments:

  1. वाह!अंतस को सहलाती सारगर्भित रचना!!!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 22 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. आदरणीय मैडम मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यावाद

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  3. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी।

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    1. आदरणीय सर बहुत बहुत शुक्रिया?

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  4. बहुत ही उम्दा लिखावट , बहुत ही सुंदर और सटीक तरह से जानकारी दी है आपने ,उम्मीद है आगे भी इसी तरह से बेहतरीन article मिलते रहेंगे
    Best Whatsapp status 2020 (आप सभी के लिए बेहतरीन शायरी और Whatsapp स्टेटस संग्रह) Janvi Pathak

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर

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  5. सुन्दर रचना

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर

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  6. उम्दा लिखावट ऐसी लाइने बहुत कम पढने के लिए मिलती है धन्यवाद् (सिर्फ आधार और पैनकार्ड से लिजिये तुरंत घर बैठे लोन)

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  7. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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  8. बहुत ही सुंदर हृदयस्पर्शी सृजन आदरणीया।
    सादर

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

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  9. सरहदों से आती आवाजें हमें बताती हैं क‍ि जीवन और देश के प्रत‍ि कर्तव्यों के बीच कैसे सामंजस्य ब‍िठाए जाते हैं ... बहुत खूब ल‍िखा क‍ि इंतज़ार मुझे हराता नहीं है
    वो ख़त्म होती ख़ुशी को
    रोज़ मैं
    खींच कर, खरोंच कर
    बचा कर
    जी रही हूँ
    फिक्रमंद ज़िन्दगी रोज़ मरती है ...वाह

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आपका

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  10. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार( 31-07-2020) को "जन-जन का अनुबन्ध" (चर्चा अंक-3779) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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    1. आदरणीया बहुत बहुत शुक्रिया आपका मेरी रचना को चर्चा अंक में स्थान देने के लिये ।

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  11. Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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  12. सरहदों से तुम्हारा आना
    पलाश के फूल की तरह
    वहीँ तो खिलते हैं
    उमीदों की तपती दोपहर में
    तुम आओगे तो न
    बहुत दिनों से कह तो रहे हो
    पर आने के तुम्हारे संदेशों में
    इंतज़ार मुझे हराता नहीं है
    वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण सृजन।

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    1. आदरणीया बहुत बहुत शुक्रिया आप का 🙏

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  13. सुंदर और सराहनीय बेहतरीन प्रस्तुति

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    1. तहेदिल से शुक्रिया आप का ।

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  14. हृदयस्पर्शी रचना

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  15. मेरी ब्लाग पर आने के लिए तहेदिल से शुक्रिया आप का 🙏

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  17. किसी शोख रँग को छुपा के रखने की चाहत ... किसी ख़ास के लिए ही तो रहिति है ... लाजवाब रचना ...

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    1. आदरणीय सर तहेदिल से शुक्रिया आपका ।

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  18. शानदार रचना । मेरे ब्लॉग पर आप का स्वागत है ।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

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  19. मन को आन्दोलित करती रचना.

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीया।

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  20. अति सुंदर व मार्मिक ।

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  21. बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।

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