Showing posts with label दुनिया. Show all posts
Showing posts with label दुनिया. Show all posts

Wednesday, 12 January 2022

मेरी आवाज़ खो सी गइ है कहीं


 ज़माने की रौनक में 

ज़िन्दगी ढूंढने का मसला 

रफ़्तार के बीच 

कहीं पीछे छूट जाने का डर 

पहचान को बरक़रार 

रखने की जद्दोजहत 

हुज़ूम के बीच की ज़िन्दगी 

जहाँ तिल भर भी हिलने की 

जगह न हो 

कभी कभी भ्रम होता है 

जीवन को सांसे 

मिल भी रही है की नहीं 

कोई खेल रहा है 

तुम्हारे साथ 

ताश की बाज़ी 

कौन सा पत्ता अब 

टेबल पर पड़ने वाला है 

बढ़ता टेंशन का लेवल 

मेरी आवाज़ मुझमें ही 

खो सी गइ है कहीं 

दुनिया के बाज़ार में

शब्द सब खर्च हो गए हैं 

जीने के लिए अगले 

दिन में ढकेल दिए 

जाते हो 

इतनी रफ़्तार में 

दोस्त और दुश्मन

दोनों को समझ पाना 

बड़ा मुश्किल है

प्यार और नफरत 

सिक्के के दो पहलु

पर सिक्का अब

घूमता ही रहता है

बहुत तेज़ी से 

जिससे की तुम 

कुछ महसूस ही 

नहीं कर पाओ 

जब दूभर हो जाता है 

इन सब के बीच जीना 

तब अकेले निकल पड़ना 

लॉन्ग ड्राइव के लिए 

सन्नाटे की खोज में 

जहाँ अपनी आवाज़ 

लौटकर खुद अपने 

को सुनाई दे 


Tuesday, 2 June 2015

आँखों की नीलामी


कल बाज़ार में बड़ा शोर था
किस बात का हल्ला चारों ओर था
क्या किया तुम्ने ? 
मैने कहा - कल मैने अपनी आँखें
बड़े अच्छे दामों में बेच दी
ये मेरी हैसियत से ज़्यादा 
बड़े -बड़े सपने देखा करती थी
इस ज़माने में दाल - रोटी कमाने में 
हौसला परास्त हो जाता है
ये जब देखती है
रात का अंधकार काले साए
अबला नारी चीख पुकार 
अपहरण हत्या और अत्याचार
तब ये लाल हो जाती है
लहू के रगं सी 
इनके लाल होने से मैं बहुत डर जाता हूं
क्योंकि ज़ुबान बदं रखना और
मुट्ठी को भिचें रखना पड़ता है 
कसकर
वरना जुनून सवार हो जाता है
हर एक को आँखों के रंग में रंगने का
मैं कब से सोच रहा था 
की इनके लाल होने से पहले 
इनको बेच दूँगा
इसलिए मैने चुपचाप सौदा कर लिया
पर सौदा आखों का था न
इसलिए बड़ा शोर था 
अब नई आँखें हैं
पत्थरों की तरह 
न सपनें देखती न दुनिया की हलचल !


Wednesday, 13 May 2015

जब दुख था नन्हा पौधा जीवन में


जब दुख था नन्हा पौधा जीवन में 
तब आँखे भर जाती थी बात बात में 

दिल पर लग जाती थी बाते हर रूप में 
तब दिमाग और दिल अलग अलग सोचते 
दिमाग बंद कमरे में था और 
दिल निकल पड़ा था अपनों की खोज में 
दिल नादान था 
बहुत ठोकरे खाता इस भाग दौड़ में 
कुछ नहीं मिला, सब से था उसे गिला 
कुंदन का मर्तबान पर, विष था भरा हुआ 
दिमाग ने दिआ उसे दिलासा 
कहना सुन मेरा ,कोई नहीं है तेरा 
अपनों से प्यार पाने की होड़ में 
लहू हो गए तेरे पैर ,अब पीछा छोड़
आंसू के सागर को सूख जाने दे 
दिमाग को बंद कमरे से बहार आने दे 
अपने दिमाग की सुन कर चल 
दिल से कह ,अब तू न बच्चों की तरह मचल 
दुनिया बहुत ख़राब है 
आसुँओ को बहाना नहीं, पीना सीख 
क्योंकि वही तो तेरे पास रखी शराब है 
इतना नशा है इसमें कि सबका दिया 
दुख डूब जाता है ,
नहीं आता फिर दिमाग होश में ।

Tuesday, 12 May 2015

माँ का आँचल


पाँचों में है झगड़ा
आँचल की छाँव का है लफड़ा
माँ तेरी साड़ी कितनी प्यारी
नर्म मुलायम सतरंगी धारी
दीदी तुम दोनों गोद से उतरो
मैं हूँ सबसे छोटा
अब छुपने की मेरी बारी
माँ तेरी साड़ी में रोटी की महक समाई है
माँ का आँचल तार – तार है
उसे अपने सब बच्चों से प्यार है
फटे हुए आँचल में वो
सबको समेट लेती है
आँचल की ठंडक सबको घेर लेती है

माँ के आंचल में दुनिया समाई है |

मातृ दिवस की शुभकामना ...