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Saturday, 28 May 2016

माँ की परछाई


माँ तुम्हारी परछाई को
धीरे धीरे अपने में
समाहित होते देख रही हूँ 
बचपन का खेल
तुम्हारी बिंदी और साड़ी से 
अपने को सजाना 
फिर कुछ वर्षों बाद
तुम्हारी जिम्मेदारियों में 
तुम जैसा बन्ने की
कोशिश में तुम्हारा
हाथ बटाना
जब विदा हुई नए परिवेश में
तब हम तुम एक परछाई के 
दो हिस्से हो गए 
अब मैं और भी तुममे 
ढल जाती हूँ 
प्यार ममता सुख दुःख 
सब आँचल में समेटना 
सीख लिया है
वो बचपन में ज़रा सी चोट पर 
आंसू बहाना
पर अब  चूल्हे की लपटों से 
झुलसे हाथों को 
छुपाना सीख गयी हूँ
अब मैंने तुम्हारी परछाई को 
पूरा अपने में डुबो दिया है 
वो बचपन का खेल नहीं था 
वो एक बेटी का माँ के रूप में 
ढलने की शायद शुरुआत होती है । 

Tuesday, 12 May 2015

माँ का आँचल


पाँचों में है झगड़ा
आँचल की छाँव का है लफड़ा
माँ तेरी साड़ी कितनी प्यारी
नर्म मुलायम सतरंगी धारी
दीदी तुम दोनों गोद से उतरो
मैं हूँ सबसे छोटा
अब छुपने की मेरी बारी
माँ तेरी साड़ी में रोटी की महक समाई है
माँ का आँचल तार – तार है
उसे अपने सब बच्चों से प्यार है
फटे हुए आँचल में वो
सबको समेट लेती है
आँचल की ठंडक सबको घेर लेती है

माँ के आंचल में दुनिया समाई है |

मातृ दिवस की शुभकामना ...