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Sunday, 30 August 2026

तेरी यादों का अल्ज़ाइमर



 वो मुलाक़ात का सफ़र 
बहुत ख़ास कुछ भी नहीं 
अपने पर अपनी ही ज़फ़र 
उन यादों को बक्से में समेट कर 
हज़ारों मील दूर चले जाना 
एक एक यादों को रोपना 
बीज और नन्हे पौधे से 
बरगद तक का सफ़र 
कभी अपने में खोकर 
सारी यादों की चादर 
समेट कर ओढ़ना 
कभी ज़िम्मेदारियों में 
खोकर सारी यादों 
को भूल जाना 
अपने वजूद को भूल जाना 
ये यादों का आना और जाना 
मेरे वैद्य ने तो इसे 
अल्ज़ाइमर का नाम दे डाला 
हाँ शायद सच ही है 
तेरी यादों का अल्ज़ाइमर ।

Thursday, 3 December 2015

जब बात सबूतों की चली


तुमने बड़ी खामोशी से लौटाए कदम
पर मेरे दिल पर दस्तक हो ही गई मेरे हमदम 
आते हुए कदमों में एक जोश था
लौटता हुआ हर कदम ख़ामोश था 
वो शिकायतों की गिरह ख़ोल तो देता 
जो तूने अपने मन में बांधी थी
दो लफ़जों में बोल तो देता
नासूर जो तूने बिना वजह पाले
उसकी दवा मुझसे पूछ तो लेता, ओ मतवाले 
चाँद को गवाह बना कर किए थे जो वादे
क्यों भोर होने तक कमज़ोर पड़ गए तेरे इरादे 
तेरी नज़रों का वो धोख़ा था 
वो धुँध में जो साया था 
वो मेरा वजूद था 
वर्षों से मुझमें समाया था 
वो मेरा आत्मसम्मान था 
जो तुझ से टकराया था 
तुम बात सबूतों की मत करो 
कभी अपने गिरहेवांह में भी झाँका करो

Friday, 31 July 2015

तक़दीर का कैनवास


बड़े ही ख़ूबसूरत रंगों से भरा हुआ था
ज़िंदगी का कैनवास 
अचानक से सारे रंग छलक गए
वो मेरे सूर्तेहाल और मुसतकबिल को 
पूरा का पूरा भिगो गए 
अब नया कैनवास है 
उसके लिए नहीं बचा कोइ रंग 
नया कैनवास मेरे वजूद की 
पहचान बन गया है 
डर लगता है 
रंगो को छूने में, क्योंकि?
छलके थे जब सारे रंग 
मिलकर बन गए थे स्याह रंग 
जिससे बनती है ख़ौफ़नाक तस्वीर
जिससे लिखी जाती है 
एक अपमान वाली भाषा 
जिससे बनती है भयानक आँखें
जो बंद दरवाजे के बाद भी घूरती रहती है 
उस कैनवास में अब
बिना रंगो वाली तस्वीर बन गई है 
जिसमें नजर आते है 
हिरास, बदर्जए-मजबूरी, बदरौनक और हिज्र 
उस कैनवास को स्याह रंगों से बचा कर रखना
बमुशिकल है ।