पर मेरे दिल पर दस्तक हो ही गई मेरे हमदम
आते हुए कदमों में एक जोश था
लौटता हुआ हर कदम ख़ामोश था
वो शिकायतों की गिरह ख़ोल तो देता
जो तूने अपने मन में बांधी थी
दो लफ़जों में बोल तो देता
नासूर जो तूने बिना वजह पाले
उसकी दवा मुझसे पूछ तो लेता, ओ मतवाले
चाँद को गवाह बना कर किए थे जो वादे
क्यों भोर होने तक कमज़ोर पड़ गए तेरे इरादे
तेरी नज़रों का वो धोख़ा था
वो धुँध में जो साया था
वो मेरा वजूद था
वर्षों से मुझमें समाया था
वो मेरा आत्मसम्मान था
जो तुझ से टकराया था
तुम बात सबूतों की मत करो
कभी अपने गिरहेवांह में भी झाँका करो

