उस गठरी से बहुत कुछ अच्छा
पीछे छूटकार बिख़रता गया
जिसे न बटोर पाए न वक्त से देख़ा गया
अब जिंदगी बेतरतीबि से रख़े सामान की तरह हो गई है
मन करता है की काश?
जिंदगी रेशम पर पड़ी सिल्वटों सी होती
मुट्ठी भर पानी के छीटें मारते
प्रेस करते और नए सिरे से जीते
या जिंदगी की इबारत
कच्ची स्याही से लिखी होती
अगर बारिश में भीग चुकी होती
नए सफ़े से फ़िर शुरू होती
पर नहीं कुछ बदल पाते
उन्ही सिलवटों में बाहर निकलने
का रास्ता ढूंढ़ते
पक्की स्याही का रंग नहीं धुलता
इसलिए जीवन में रंग सजाने की
कोशिश जारी रख़ते
फ़िर से जीने की तमन्ना में
तमाम रातें मौत को गले मिलने का न्यौता देकर
धोख़े से रास्ता बदल लेते हैं
क्या करे सिलवटों और फ़ैली स्याही में
जीने की आदत जो बरसों से पड़ी है
क्या इंसान वाकई जीवन का मतलब
सारी ज़िंदगी समझ नहीं पाते
