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Monday, 25 May 2015

इंतज़ार


हालातों ने उसकी खुशी को
कही दफ़ना दिया
उससे छीन कर उसकी मुस्कुराहट को
कहीं छिपा दिया
चाहती थी वो सूरज की किरनों से पहले
दौड़ कर धरा को छू लू
गुन-गुनी धूप सी गरमाइश
हाथों में हुआ करती थी
जाड़े में गुलमोहर के नीचे
इंतज़ार खत्म होता था
और सर्द हवाओं में
काँपते उसके हाथ 
होते थे तुम्हारे हाथों में
वो गरमाइश अब बर्फ हो गई 
वो कभी न खत्म होने वाली
बातों का सिलसिला
अब कभी-कभी कानों मे
कहीं दूर गूंजता सा है
वो तुम्हारी उपमा
सुबह के सूरज की आभा
चहरे से बहुत दूर हो चली है
अब माथे पर लकीरें हैं
पगडंडियों की तरह
जिनमें खो कर अपने आप को ढूँढना
बहुत मुश्किल है
वो झुके हुए कंधे और बढ़ता हुआ बोझ
पुराने वक़्त को किसी खोए हुए सिक्के की तरह
ढूँढती है आँखें ।

Sunday, 16 June 2013

एक सुबह ऐसी हो !


कुछ नहीं बन पाती हूँ मैं
टूट जाती हूँ, बिखर जाती हूँ
फिर कुछ सोचकर सिमट जाती हूँ मैं
जीने के लिए
न मेरा अतीत सुनहरा था
न मेरा वर्तमान चमकीला है
हर नया दिन
धुंद और कोहरा पहन कर आता है
लगता है आँखों में कुछ दिखेगा नहीं
हाथ ही टटोलेंगे
भविष्य की मज़बूत चट्टानों को
पर, यह चट्टानें धोखा न हों
बर्फ के टीलों की तरह
कि मंजिल पर कदम पड़ते ही
पिघल गई, हों झीलों कि तरह
वही खाई, कोहरा, धुंद न हो
कोई 'सुबह' मेरी हो
जिसमें मुझे मिले
अटूट विश्वास, दिपदिपाता भविष्य
और मज़बूत इरादे
धुंद और कोहरे कि दीवारों से दूर
जहाँ छल कपट, भुलावा न हो
कोई सुबह ऐसी हो
जिसमें मैं कुछ बन पाऊं
कभी टूटूं  न, कभी बिखरूँ न
सुनहरी राह पर चल पाऊं
उस मासूम बच्चे कि तरह
जो चलना सीख जाता है
तो अटूट विश्वास से
भर जाता है|