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Wednesday, 15 April 2026

जब बारिश मुस्कुराई

आज बारिश बरसते हुए 

मेरे साथ मुस्कुराई 

उसने कहा, आज मैं 

आँखों के पानी की तरह 

नहीं बरसूँगी 

मुस्कुराहट के मोतियों सी 

बिखरुंगी 

कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी 

खिड़की के शीशे पर 

देर तक ठहरूंगी 

तुम वही बैठ कर 

कुछ लिखना 

मैं तुम्हारी स्याही को 

नहीं फैलाउंगी 

पर आज तुम मुस्कुराना 

आज मैं तुम्हारे शहर से

दूर नहीं जाउंगी

तुम कॉफ़ी का मग 

खिड़की पर ही रखना 

भाप और ओस से 

धुंधले हुए शीशे पर 

अपनी अँगुलियों से

उन गुज़री हुई 

तारीखों को लिखना 

कब तुम्हारी मुस्कुराहट 

खिलखिलाहट में बदल गई 

और कब डायरी 

इंतज़ार शुरू और खत्म 

होने की तारीखों 

दिनों महीनों सालों की कहानी 

उन उजले सफों पर 

स्याही में तब्दील हो गई ...  

Tuesday, 4 August 2015

मेरी बेटी और डायबिटीज़


तुम आइ थी जब मेरी गोद में 
मुझे लगा एक परी छुपी हुइ थी
जैसे बादलों की ओट में 
तुम्हारी शरारतें वो चंचलता
तुम्हारा बचपन अभी बीता भी न था 
और भाग्य दे गया बहुत सी चुभन
तुम में है अदभुत प्रतिभा 
तुम हो सुंदरता की प्रतिमा 
तुम्हारी ये सुइयों से दोस्ती
तुम हँस कर छिपा लेती हो 
अपने आँखों के मोती 
तुम्हारी उम्र के सुनहरे ख्वाब
और आगे बढ़ने का जज़्बा
तुम्हारा साहस और हिम्मत संग
रोज़ डायबिटीज़ से लड़ने की जंग 
तुम्हारा युवा मन बहुत कुछ करना चाहता है 
पर तुम्हारा भाग्य कुछ निणनय टालता भी है
हर रोज़ सुइयों की चुभन 
और तुम्हारा कोमल तन
मेरे मन को एक एक सुइ से 
गहरे भेदता जाता तुम्हारा तकलीफों वाला जीवन
तुम मेरा गम मुस्कुरा कर बाँटना चाहती हो 
कहती हो माँ मेरे जैसे है लाखों बच्चे 
पर क्या करूँ मैं एक माँ जो हूँ

मेरी बेटी १२ साल से टाइप वन डायबिटिक है...

Monday, 25 May 2015

इंतज़ार


हालातों ने उसकी खुशी को
कही दफ़ना दिया
उससे छीन कर उसकी मुस्कुराहट को
कहीं छिपा दिया
चाहती थी वो सूरज की किरनों से पहले
दौड़ कर धरा को छू लू
गुन-गुनी धूप सी गरमाइश
हाथों में हुआ करती थी
जाड़े में गुलमोहर के नीचे
इंतज़ार खत्म होता था
और सर्द हवाओं में
काँपते उसके हाथ 
होते थे तुम्हारे हाथों में
वो गरमाइश अब बर्फ हो गई 
वो कभी न खत्म होने वाली
बातों का सिलसिला
अब कभी-कभी कानों मे
कहीं दूर गूंजता सा है
वो तुम्हारी उपमा
सुबह के सूरज की आभा
चहरे से बहुत दूर हो चली है
अब माथे पर लकीरें हैं
पगडंडियों की तरह
जिनमें खो कर अपने आप को ढूँढना
बहुत मुश्किल है
वो झुके हुए कंधे और बढ़ता हुआ बोझ
पुराने वक़्त को किसी खोए हुए सिक्के की तरह
ढूँढती है आँखें ।