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Sunday, 7 March 2021

बेटी ~ एक नायाब हीरा


बेटी पराया धन नहीं 

माँ - बाप का नायाब हीरा होती है 

बेटी की विदाई 

यह एक शब्द है 

पर क्या हम वाकई 

बेटी को विदा कर पाते हैं 

दो बक्सों में सामान रखने से 

बेटी की विदाई 

संपूर्ण नहीं होती 

उसने इतने सालों से

जो उस घर को बिखेर रखा है 

वो सामान जो 

हमारे रग रग में बसा है 

हम कैसे उसे समेटे 

पूरे घर में उसकी खुशबू 

उसकी हंसी 

उसकी मुस्कुराहट

उसके सुख दुःख 

घर के हर कण कण में समाये हैं 

स्त्री एक अद्वितीय रचनाकार है 

जो रचता है 

उसे हम विदा कैसे करें 

बेटी विदा नहीं होती 

वह एक और 

नए संसार को रचती है 

नए रिश्ते को पूर्ण करती है 

अपने परिवार से नए 

परिवेश को जोड़ती है 

बेटी पराया धन नहीं 

एक नायाब हीरा है 


Friday, 19 February 2016

वो ठहरा हुआ चाँद


मेरे सिरहाने वाली खिड़की 
तब से मैने ख़ुली ही रख़ी है 
क्योंकि उसके ठीक सामने 
चाँद आकर रुकता है 
एक छोटे तारे के साथ 
मेरे पास बहुत से सवालों
के नहीं है हिसाब
वर्षों से रोज़ रात 
मेरे सिरहाने बैठ कर 
बेटी पूछती है 
"माँ , पापा कभी लौट कर आएंगे क्या ?"
मैं खिड़की पर थमे हुए चॉंद में 
तुम्हारी तस्वीर उसे दिखाती हूँ 
हमारी अच्छी चीज़ें 
चॉंद अपने पास रखता है 
हाँ वो साथ वाला छोटा तारा 
तुम्हारी बात सुन रहा है 
और वो चाँद को बताएगा 
आने वाली कल रात को 
जो कभी नहीं आने वाली 
चाँद से बेटी को बहलाती हूँ 
वो खुली ख़िडकी
मेरे बहुत से सवालों के 
जावाब देने के काम आती है ।

Tuesday, 4 August 2015

मेरी बेटी और डायबिटीज़


तुम आइ थी जब मेरी गोद में 
मुझे लगा एक परी छुपी हुइ थी
जैसे बादलों की ओट में 
तुम्हारी शरारतें वो चंचलता
तुम्हारा बचपन अभी बीता भी न था 
और भाग्य दे गया बहुत सी चुभन
तुम में है अदभुत प्रतिभा 
तुम हो सुंदरता की प्रतिमा 
तुम्हारी ये सुइयों से दोस्ती
तुम हँस कर छिपा लेती हो 
अपने आँखों के मोती 
तुम्हारी उम्र के सुनहरे ख्वाब
और आगे बढ़ने का जज़्बा
तुम्हारा साहस और हिम्मत संग
रोज़ डायबिटीज़ से लड़ने की जंग 
तुम्हारा युवा मन बहुत कुछ करना चाहता है 
पर तुम्हारा भाग्य कुछ निणनय टालता भी है
हर रोज़ सुइयों की चुभन 
और तुम्हारा कोमल तन
मेरे मन को एक एक सुइ से 
गहरे भेदता जाता तुम्हारा तकलीफों वाला जीवन
तुम मेरा गम मुस्कुरा कर बाँटना चाहती हो 
कहती हो माँ मेरे जैसे है लाखों बच्चे 
पर क्या करूँ मैं एक माँ जो हूँ

मेरी बेटी १२ साल से टाइप वन डायबिटिक है...

Tuesday, 9 June 2015

ये पागल मन


मेरा रूप माँ बहन बेटी या गृहणि का रहता है
पर मेरा मन हर दिन नई कविता कह लेता है
शंखनाद हो जाता है
सुबह के सूरज की लालिमा से
उद्गम हो जाता है सरिता का
बहने लगते हैं शब्द कई
उन्हें मैं चुनती जाती हूँ
पहल करती हूँ ईश्वर की पूजा से
बच्चों की मासूमियत से
आँगन की रांगोली से 
सूखे आंटे में, अंगुलियाँ फिरा के
कई शब्द चुन लेती हूँ
फिर रोटी की पीठी में
शब्दों को गढ़ देती हूँ
दूसरे पहर आते -आते
मेरी कविता भी कुछ पल 
पड़ाव पर आकर विश्राम कर लेती है
ढलते सूरज के पल
घर लौटते पंछी 
शाम की आरती से
सभी अपनों का इंतज़ार खत्म होता है
अपनी जिम्मेदारी के लिबास को उतार कर 
धवल चाँदनी की खामोशी में
दिनभर के चुने हुए शब्दों से
कविता का अंतिम रूप सजता है
ये पागल मन ऐसे ही हर दिन 
नई कविता रचता है |