बेटी पराया धन नहीं
माँ - बाप का नायाब हीरा होती है
बेटी की विदाई
यह एक शब्द है
पर क्या हम वाकई
बेटी को विदा कर पाते हैं
दो बक्सों में सामान रखने से
बेटी की विदाई
संपूर्ण नहीं होती
उसने इतने सालों से
जो उस घर को बिखेर रखा है
वो सामान जो
हमारे रग रग में बसा है
हम कैसे उसे समेटे
पूरे घर में उसकी खुशबू
उसकी हंसी
उसकी मुस्कुराहट
उसके सुख दुःख
घर के हर कण कण में समाये हैं
स्त्री एक अद्वितीय रचनाकार है
जो रचता है
उसे हम विदा कैसे करें
बेटी विदा नहीं होती
वह एक और
नए संसार को रचती है
नए रिश्ते को पूर्ण करती है
अपने परिवार से नए
परिवेश को जोड़ती है
बेटी पराया धन नहीं
एक नायाब हीरा है

