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Thursday, 3 August 2017

क्यों बेकार में खामखा की ज़िद


कई दिनों से खामखा की ज़िद 
वह श्रृंगार अधूरा सा क्यों है 
अब क्या और किस बात की जिरह 
मेरे पास नहीं है वो ज़ेवर 
जो तुम्हे वर्षों पहले चाहिए थे
वह सब मैंने ज़मीं में दफ़न कर दिया है 
हालात बदल गए हैं 
तुम उस ख़ज़ाने को ढूंढना चाहते हो 
और चाहते हो की उस
एक एक आभूषण को 
मैं धारण कर लूँ 
वो ख़ज़ाने का सामान 
वो कहकहे वो इंतज़ार 
वो आँखों की चमक 
वो गालों का दहक उठना 
वो बातों की खनक 
सब तुम्हारी आखरी मुलाक़ात के बाद 
वहीं दफ़न कर दिया था 
क्योंकि मुझे उन गहनों की
आदत नहीं रही 
वो श्रृंगार अब नहीं कर सकती 
क्यों बेकार में खामखा की ज़िद 

Monday, 25 May 2015

इंतज़ार


हालातों ने उसकी खुशी को
कही दफ़ना दिया
उससे छीन कर उसकी मुस्कुराहट को
कहीं छिपा दिया
चाहती थी वो सूरज की किरनों से पहले
दौड़ कर धरा को छू लू
गुन-गुनी धूप सी गरमाइश
हाथों में हुआ करती थी
जाड़े में गुलमोहर के नीचे
इंतज़ार खत्म होता था
और सर्द हवाओं में
काँपते उसके हाथ 
होते थे तुम्हारे हाथों में
वो गरमाइश अब बर्फ हो गई 
वो कभी न खत्म होने वाली
बातों का सिलसिला
अब कभी-कभी कानों मे
कहीं दूर गूंजता सा है
वो तुम्हारी उपमा
सुबह के सूरज की आभा
चहरे से बहुत दूर हो चली है
अब माथे पर लकीरें हैं
पगडंडियों की तरह
जिनमें खो कर अपने आप को ढूँढना
बहुत मुश्किल है
वो झुके हुए कंधे और बढ़ता हुआ बोझ
पुराने वक़्त को किसी खोए हुए सिक्के की तरह
ढूँढती है आँखें ।

Wednesday, 20 May 2015

अरुणा शानबाग को श्रद्धांजली



जिस्म ने अपनी
हल - चल खो दी थी  
पर आत्मा अब भी
जंग लड़ रही थी
कानो में पिघल रहा था
लाचारी बेबसी और  
भयानकता का शोर
जिस मोड़ पर देखे थे
सुनहरे सपने  
मन के अंधेरे कोने में
बंद पड़े थे
आत्मा ने बहुत कोशिश की
इन बेजान सांसो में
फिर खुशियाँ भर पाँऊ
मन के अंधेरे कोने में
बंद पड़े सुनहरे सपनों
की गठरी को
खोल कर सजाया भी
उसके सामने, पर
हालात से चोट खाया जिस्म
आत्मा के मोह में नहीं आया
वह अपने सुनहरे सपनों को लेकर
वापस ज़िन्दगी की ओर
मुड़ नहीं पाया ।