Showing posts with label याद. Show all posts
Showing posts with label याद. Show all posts

Sunday, 21 January 2024

वो एक नदी यादों की


वो एक नदी यादों की 

मेरे साथ बहती बहती 

एक कहानी बन गई 

मैं वो तुम्हें सुनाना चाहती थी 

मुकम्मल होने तक कहानी 

तुम्हारी ख़ामोशी है ज़रूरी 

पर क्या तुम मौन रहोगे 

क्या तुम मुझे सुन रहे होगे 

बहुत कठिन होता है 

किसी को ख़ामोशी से सुनना 

तुम्हारी आंखो को 

मुझे समझना होगा 

क्योंकि वो दिमाग़ के

अनचाहे वाकयात को 

बंया कर देती हैं 

मेरी यादें मेरी कहानी 

वो शतरंज का खेल है न

उससे मिलती जुलती है 

तुमने कहा एक प्यारा शब्द 

कल कॉफी शॉप में बैठ कर 

तफ़सील से सुनूँगा 

मैंने कहा अपने आप से 

पर वहाँ तो मुझे अपनी कहानी 

घर पर छोड़ कर जानी होगी 

नए दौर का नया फ़रमान 

वो मेरा तफ़हीम से कहना 

उस माहौल में मेरी कहानी 

शब्द शब्द बदलना होगा मुझे 

क्योंकि तुम कदर-शनास नहीं 

कभी कभी मुझे लगता है 

मेरी कहानी 

उँचे पेड़ पर टंगी 

मुझे चिढा रही है 

की मैं न कभी 

सुना सकूँगी 

वो एक नदी सी 

मेरे साथ-साथ 

बहती रहेगी...

Wednesday, 13 December 2017

बेजान यादें


इस वर्ष श्राद्ध में
मैंने तुम्हारी यादों का 
तर्पण कर दिया 
जो वर्ष पहले
धीरे धीरे मर रही थी |
तुम्हारी याददाश्त में भी 
मैं ज़िंदा कहाँ थी ?

उन बेजान यादों को 
दिल की ज़मीं से 
खाली करना
मेरा मन बार बार
न चाह कर भी 
उस ज़मीन को 
टटोलता रहता की 
शायद कहीं कोई याद
खरपतबार बनके
दोबारा पनपी हो 
शायद जंगली हो गई हो
उन्हें तरतीब से सजा दूंगी 
पर नहीं वो बंजर हो चुकी थी 
अब भटकना नहीं था 
उनको आत्मा की तरह 

इसलिए इस बार मैंने 
उनका तर्पण कर दिया
तिल और कुशा के साथ 
वो पवित्र जल 
के साथ दूर कहीं बहती गई
मैं बंधन मुक्त हो गई 
तुम्हें आज़ादी दे कर 

कहते हैं
अंजुली के पानी में 
तिल और कुशा 
डाल कर तर्पण करने से 
कुछ भी वापिस नहीं आता 

Thursday, 31 December 2015

मुखौटों का शहर


तुम इतना तेज मत चलो 
इतने आगे निकल तो गए हो 
पर कम से कम पल दो पल तो रुको 
रुख कर चलने के बीच 
इतना वक्त तो हो मेरे मीत
इंतज़ार जो तुमने किया हो मेरे लिए 
उसका मुझे अहसास तो हो 
मेरे प्यार में इतना हो दम 
मेरे इंतज़ार में थम जाए तुम्हारे कदम 
तुम्हारी आगे बढ़ने की चाह 
बदल देगी हमारी राह 
बहुत ऊँचाई तक तुम पहुंच गए हो
अगर तुम मुझे हाथ बढ़ा कर थामते
मैं भी उन उचांइयो को महसूस करती 
अब खत्म सी हो रही है कदमों की समानता 
हाथ की ठंडक से पता चल रही है 
रिश्तों की गर्माहट 
सुनहरे सपनों में उलझ कर बहुत दूर निकल गए 
बीच में वक्त के थफेड़ों ने
मिटादी पुरानी यादों की कहानी
आख़रि पड़ाओं पर 
हमारी मुलाकात वास्तविक नहीं थी 
बातों और मुलाक़ातों से ही समझा 
की आगे यात्रा
मिटा देगी मेरा अस्तित्व, क्योंकि?
अब तुम मुखौटों के शहर में
जो आ गए हो 
जहां कदम कभी थकते नहीं 
एक दूसरे का पीछे छोड़ने की चाह में 
सांस लेने को भी लोग रुकते नहीं

Wednesday, 30 September 2015

परिंदे


परिंदे नहीं होते स्वार्थी
ख़ुल कर जीते हैं
आख़िरि सांस तक 
निस्वार्थ भाव से सिख़ाते हैं
अपने बच्चो को उड़ना
ख़ुल जाते हैं जब बच्चो के पंख़ 
नहीं उम्मीद करते की
ये मुड़कर लौटेगा भी की नहीं 
आने वाला कल 
घोंसला ख़ाली होगा की भरा 
कैसे रह पाते होंगें 
उनके अपने जब दूर चले जाते होंगें
उनके आँसू उनका दिल उनका इतंज़ार
क्या वो घोंसले से निकाल फ़ेकते हैं
और उड़ जाते हैं सब कुछ झटक कर
कहीं बहुत दूर बिना यादों के

Monday, 10 August 2015

अश्क बहाना है मना



आज मेरी कलम ने किया है मना 
किसी की याद में अश्क बहाना है मना
आज कोइ नज्म नई बना
उस गली और मोड़ के शब्दों को ले 
जहॉं तू कभी खड़ा था अकेले
तब भी तो तू सुकून से जीता था 
आज फ़िर उन पुरानी राहों को नाप आ
जिनकी वीरानगी पर तू चलकर होता था ख़फ़ा
गम दे कर भूल जाना जिसकी फ़ितरत थी
तूने क्यों उसकी यादों को
सीने से लगाने की जरूरत की 
पुरानी यादों को रेज़ा-रेज़ा हो जाने दे
बेइन्तेहा बेकस हो कर डूब मत 
परेशांहाली में मयख़ाने के अंदर 
पैमाने मत तौल 
बाहर आ और ख़ुली फ़िजा में सांस ले 
चार कदम आगे बढ़ और ज़िदंगी को थाम ले 
आज मेरी कलम ने किया है मना 
किसी की याद में अश्क बहाना है मना

Friday, 3 July 2015

तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन


तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन
जब गिरता था सूखी धरती पर 
वो बारिश का पहला पानी
सारे अरमानों को जगा देती थी
मिट्टी की सौंधी खुशबू
 दिल की किताब के जब पलटते हैं पन्ने 
उस बारिश की एक बूंद
अब भी आँखों में कहीं अटकी हुई है 
वो बारिश में भीगनें की उम्र 
छप -छप करते तेरे वो कदम 
पायल के घुंघरू की आवाज़ मुझे बुलाती थी 
झलक दिख जाती अगर वो
बारिश की बूदें हथेली पर समेटने छत पर आती 
उतना ही काफी था तमाम बंदिशों में
दिल कुछ और ज़्यादा नहीं मांगता था 
तुम्हारी वो झलक ज़हन में
अब भी कहीं कैद है
बस वक्त के साथ उड़ गई
वो मिट्टी की और यादों की खुशबू
अब बारिश आती तो है
पर दिल को नहीं छूती
अब तो बस यादें हैं 
एकांत में मुस्कुराने के लिए
तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन ।

Friday, 26 June 2015

एक पिता


पिता शब्द का अहसास 
याद दिलाता है हमें
की कोइ बरगद है हमारे आस -पास
जिसकी शीतल छाया में
हम बेफ़िक्र हो कर सो सकें
जीवन में गर आए कोइ दुख 
तो उन विशाल कंधों पर
सर रख कर
जी भर कर रो सकें
वो ऐसा मार्गदर्शक है 
जो पहले खुद उन रास्तों पर
चल कर अंदाज़ा लगाता है
की अगर जिंदगी में हम गिरे तो
क्या वो खाइ हमारा
आत्मविश्वास बचा पाएगी ?

दूरदर्शिता इतनी गहरी
क्या अच्छा अौर क्या बुरा 
वो हमारे जीवन का
एक दोस्त भी और एक प्रहरी
स्वप्न हम देखते आगे बढ़ने के
वो अपने छालो वाले हाथों से
गति देता हमारे पँजों को
जो उसने अपनी उम्र में संजोए थे ख्वाब
उनमें वो पंख लगाता है
हमारे लिए बेहिसाब
उसकी नींदे ख़ाली होती सपनो से
क्योंकि ?
कंधो पर ढेरों ज़िम्मेदारी 
सुला देती है नींद  गहरी और भारी