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Sunday, 7 March 2021

बेटी ~ एक नायाब हीरा


बेटी पराया धन नहीं 

माँ - बाप का नायाब हीरा होती है 

बेटी की विदाई 

यह एक शब्द है 

पर क्या हम वाकई 

बेटी को विदा कर पाते हैं 

दो बक्सों में सामान रखने से 

बेटी की विदाई 

संपूर्ण नहीं होती 

उसने इतने सालों से

जो उस घर को बिखेर रखा है 

वो सामान जो 

हमारे रग रग में बसा है 

हम कैसे उसे समेटे 

पूरे घर में उसकी खुशबू 

उसकी हंसी 

उसकी मुस्कुराहट

उसके सुख दुःख 

घर के हर कण कण में समाये हैं 

स्त्री एक अद्वितीय रचनाकार है 

जो रचता है 

उसे हम विदा कैसे करें 

बेटी विदा नहीं होती 

वह एक और 

नए संसार को रचती है 

नए रिश्ते को पूर्ण करती है 

अपने परिवार से नए 

परिवेश को जोड़ती है 

बेटी पराया धन नहीं 

एक नायाब हीरा है 


Thursday, 31 December 2015

मुखौटों का शहर


तुम इतना तेज मत चलो 
इतने आगे निकल तो गए हो 
पर कम से कम पल दो पल तो रुको 
रुख कर चलने के बीच 
इतना वक्त तो हो मेरे मीत
इंतज़ार जो तुमने किया हो मेरे लिए 
उसका मुझे अहसास तो हो 
मेरे प्यार में इतना हो दम 
मेरे इंतज़ार में थम जाए तुम्हारे कदम 
तुम्हारी आगे बढ़ने की चाह 
बदल देगी हमारी राह 
बहुत ऊँचाई तक तुम पहुंच गए हो
अगर तुम मुझे हाथ बढ़ा कर थामते
मैं भी उन उचांइयो को महसूस करती 
अब खत्म सी हो रही है कदमों की समानता 
हाथ की ठंडक से पता चल रही है 
रिश्तों की गर्माहट 
सुनहरे सपनों में उलझ कर बहुत दूर निकल गए 
बीच में वक्त के थफेड़ों ने
मिटादी पुरानी यादों की कहानी
आख़रि पड़ाओं पर 
हमारी मुलाकात वास्तविक नहीं थी 
बातों और मुलाक़ातों से ही समझा 
की आगे यात्रा
मिटा देगी मेरा अस्तित्व, क्योंकि?
अब तुम मुखौटों के शहर में
जो आ गए हो 
जहां कदम कभी थकते नहीं 
एक दूसरे का पीछे छोड़ने की चाह में 
सांस लेने को भी लोग रुकते नहीं

Friday, 24 July 2015

तुम्हारा प्यारा सा नाम


तुम आती हो नए घर संसार में 
सपने हजारों हैं अपनों के प्यार में 
सुबह मंदिर की प्रार्थना में 
औरों का दुख दर्द
मांगती अपने हिस्से में 
सबको खिलाने के बाद 
आधे पेट खाने से ही हो जाती तृप्त
तुम्हारा पसीना है टपकता 
सारा आशियाना है चमकता
रसोइ का धुअाँ बहुत गहरा
तुम्हारा अस्तित्व नहीं कुछ कह रहा
घर के अंदर से बाहर तक 
उसी के कंधे पर है टिकी
घर की एक -एक मंयार
तुम खो गई उस घर में
पर जब घर के द्वार पर दस्तक होती है  
हर कोइ पूछता है 
दरवाज़े पर लगी नेम-प्लेट वाले शख्स को 
तुम्हारा नाम उस घर में कहीं गुम गया है
तुम्हें तो रिश्ते आपना नाम दे चुके हैं
पत्नी, बहू, माँ और भाभी का
कब वक्त आएगा कि लिखा हो 
घर के बाहर तुम्हारी पहचान के साथ
तुम्हारा प्यारा सा नाम

Friday, 22 May 2015

स्त्री


मैं स्त्री हूँ इसलिए मैं 
हर रिश्ते को काटती और बोती हूँ 
हर रिश्ते के रास्ते से मैं गुज़री हूँ 
हर रिश्ते को मैने जिया है
हर रिश्ते की कड़वाहट को मैंने पिया है
मैं एक स्त्री हूँ इसलिए मैंने 
फटे टूटे नए पुराने सभी रिश्ते सिए हैं 
सब रिश्तों को दम घुटने से बचाती हूँ
इसलिए पता नहीं मैं इस फेर में 
कितनी बार जीती और मर जाती हूँ 
कुछ रिश्ते ही सुख देते हैं 
बाकी सब तो घावों से दुख देते हैं 
पर मजबूरी सबको ढोना है
रिश्ते के ताने बांने का बिछौना है 
नीदं भले ना आए 
इसी पर हर स्त्री को सोना है |