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Wednesday, 13 December 2017

बेजान यादें


इस वर्ष श्राद्ध में
मैंने तुम्हारी यादों का 
तर्पण कर दिया 
जो वर्ष पहले
धीरे धीरे मर रही थी |
तुम्हारी याददाश्त में भी 
मैं ज़िंदा कहाँ थी ?

उन बेजान यादों को 
दिल की ज़मीं से 
खाली करना
मेरा मन बार बार
न चाह कर भी 
उस ज़मीन को 
टटोलता रहता की 
शायद कहीं कोई याद
खरपतबार बनके
दोबारा पनपी हो 
शायद जंगली हो गई हो
उन्हें तरतीब से सजा दूंगी 
पर नहीं वो बंजर हो चुकी थी 
अब भटकना नहीं था 
उनको आत्मा की तरह 

इसलिए इस बार मैंने 
उनका तर्पण कर दिया
तिल और कुशा के साथ 
वो पवित्र जल 
के साथ दूर कहीं बहती गई
मैं बंधन मुक्त हो गई 
तुम्हें आज़ादी दे कर 

कहते हैं
अंजुली के पानी में 
तिल और कुशा 
डाल कर तर्पण करने से 
कुछ भी वापिस नहीं आता