Saturday, 16 September 2023

बारिश का मौसम आ गया



बहुत अरसों से पहली बारिश में भीगा करती थी 

अपने चेहरे को ऊपर करके

दोनो हथेलियों को खोल कर 

पता नहीं क्यों वो भीगना

मुझे बहुत ही सुकून देता 

वो भीगने का सिलसिला 

साल दर साल चलता रहा 

बारिश का मौसम आता

और मेरे अंतर मन के 

घुटन के सारे सैलाब को 

बह ले जाता

आँखों के कोरों के मोतियों को 

अपनी बूँदों में मिलाने का जादू 

बारिश को ही आता है

मेरे ज़हन को हल्का करके 

वो मोती कहीं किसी

सीप में बंद हो जाते होंगे

बहुत ही ज़हीन सा लफ़्ज़ है बारिश

बड़ा इंतेज़ार रहता है 

पहली बारिश का 

बूँदे और बारिश कि आवाज़ 

घंटों सुनते रहने के बाद भी 

पहली मुलाक़ात सी नई लगती है 

इस बरस भी 

बारिश का मौसम आने वाला है 

भीगना है मुझे क्योंकि 

पिछली बारिश की बूँदों

के निशान को मिटाने

गुज़रे हुए लम्हों को मिट्टी में दबाने 

नई बूँदें आयी हैं 

बारिश का मौसम गया

Wednesday, 14 June 2023

बचपन के रास्तों के पेड़


बचपन के रास्तों के पेड़
वक्त के साथ साथ 
वो भी उम्रदराज़ हो गए हैं ।
अब जब भी मैं गुज़रती हूँ
उन रास्तों से 
धुंधली यादों के साथ..
गुज़रा वक्त अब भी
सलाख़ों में क़ैद है कहीं ।
पुरानी बातों के 
ज़िरह के दस्तावेज़ों को 
मैं नहीं खोलती ।
किन तारीख़ों को क्या सज़ा
मुक़र्रर हुई..
मैं कब सब से
आखिरी बार मिली..
इन सब हिसाबों के 
काग़ज़ात की फ़ाइल को 
बांधने वाली डोरी अब
गल चुकी है ।
अब उस फ़ाइल को खोलने
का रिस्क नहीं लेती
उड़ते काग़ज़ों को दोबारा
समेटने में बहुत हिम्मत चाहिए ।
और उन नीम पीपल सागोन की 
गवाही अब भी बदली नहीं है ।
उन सब तारीख़ों को उनने 
अपने वलय में समेट रखा है ।
कहते हैं पेड़ के वलय से 
पेड़ की उम्र का पता जो चलता है ।
बहुत शौक़ था तुम्हें
मुझसे वकालत करने का 
अब तुम अपने जिरह के 
काग़ज़ात समेट लो 
कुछ ना बोलो 
दरख़्तों से कहो वक्त को 
उम्र कैद में रहने दो 
और इस सज़ा को 
मुक़र्रर  बरकरार रहने दो ।

Sunday, 2 April 2023

पत्तियों सी ज़िन्दगी ...

 मुझे मेपल ट्री की पत्तियाँ बहुत ख़ूबसूरत लगती हैं।

कल मेरी बेटी ने विदेश से लौटते वक्त

मुझसे पूछा..माँ आपके लिए क्या लाऊँ तौहफ़ें में

मैंने कहा बस दो चार

मेपल ट्री की पत्तियाँ ले आना 

चाहे सूखी ही क्यों हो।

ये ज़िंदगी की हकीकत का आईना हैं।

सूखी पत्तियाँ अच्छी लगती हैं।

सच जीवन का आपके सामने परोस देती हैं।

एक वक्त के बाद वो दरख़्त 

को अलविदा कह देती हैं।

या शायद दरख़्त उसे 

अहसास कराती हैं..ये 

कोमल पत्तियाँ जीवन की परिपक्वता की तरह

फिर पीली हो चुकी पत्तियाँ

जीवन की पूर्णता को दर्शाती हुई।

टूट कर बिखरने के कगार पे

मानव जीवन की तरह

रूह को जिस्म से जुड़े रहने तक

और फिर टूट कर बिखर गयी

वजूद के खोने तक

इस जहान में खो गयी

जैसे जिस्म रूह से जुदा होकर

खाक होकर उड़ गया

कायनात में कहीं

शाख से जुदा हुए पत्ते की तरह

कहाँ से कहाँ तक का सफ़र

फिर कहाँ जन्म लेना है कुछ नहीं खबर।

सूखे पत्ते की तरह चूर चूर हो जाता

हमारा घमंड, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष

अपना वजूद खो कर

हवा में घुल जाना 

रूह की तरह ...