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Wednesday, 14 June 2023

बचपन के रास्तों के पेड़


बचपन के रास्तों के पेड़
वक्त के साथ साथ 
वो भी उम्रदराज़ हो गए हैं ।
अब जब भी मैं गुज़रती हूँ
उन रास्तों से 
धुंधली यादों के साथ..
गुज़रा वक्त अब भी
सलाख़ों में क़ैद है कहीं ।
पुरानी बातों के 
ज़िरह के दस्तावेज़ों को 
मैं नहीं खोलती ।
किन तारीख़ों को क्या सज़ा
मुक़र्रर हुई..
मैं कब सब से
आखिरी बार मिली..
इन सब हिसाबों के 
काग़ज़ात की फ़ाइल को 
बांधने वाली डोरी अब
गल चुकी है ।
अब उस फ़ाइल को खोलने
का रिस्क नहीं लेती
उड़ते काग़ज़ों को दोबारा
समेटने में बहुत हिम्मत चाहिए ।
और उन नीम पीपल सागोन की 
गवाही अब भी बदली नहीं है ।
उन सब तारीख़ों को उनने 
अपने वलय में समेट रखा है ।
कहते हैं पेड़ के वलय से 
पेड़ की उम्र का पता जो चलता है ।
बहुत शौक़ था तुम्हें
मुझसे वकालत करने का 
अब तुम अपने जिरह के 
काग़ज़ात समेट लो 
कुछ ना बोलो 
दरख़्तों से कहो वक्त को 
उम्र कैद में रहने दो 
और इस सज़ा को 
मुक़र्रर  बरकरार रहने दो ।

Tuesday, 19 July 2022

मिट्टी बन्ने में वक़्त लगेगा



मिट्टी में मिलने के बाद

ये काया धीरे-धीरे

मिट्टी हो जाया करती है।

उसे कोई चाह कर भी 

नहीं रोक पाता

पर मिट्टी में मिलने के बाद

जो हम में बसता रहता है।

सालों साल वो अहंकार

पर्वत सा

वो प्रतिस्पर्धा ज्वाला सी 

वो नफ़रत पत्थरों सी

वो जिजीविषा सौ बरस जीने की

वो माया जाल ना टूटने वाले

ताने बाने का 

इन बीहड़ों में उलझी हुई आत्मा

इन सारे मिट्टी के टीलों को

जिन्होंने बहुत पहले मिट्टी

हो जाना चाहिए था।

ये आत्मा के साथ

आत्मसात् हो जाते हैं।

ना होते तो फिर 

इनके जीवित

रहने से 

मिट्टी को भी 

मिट्टी बन्ने में 

वक्त लगेगा।