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Tuesday, 16 June 2015

सावन की बूँदें


सावन की बूँदें जब 
टिप -टिप हथेली पर गिरती हैं 
एक -एक यादों की पहेली 
धीमें- धीमें खुलती है

दिल में बंद यादों की पहेली
वो है उसकी सबसे अच्छी सहेली
खुलती है जब खिलखिलाति है तब
बीते सुनहरे पलों में वो उसे ले जाती है 

जहाँ थी भीगी चुनरी
झूले की पीगें
धूएँ की सौंधी खुशबू 
गर्म चाय के प्यालों में घुलती थी 
वो नज़रों का कहीं थम जाना 

कुछ पल ठहरना
ठहर कर वापस आ जाना
वापस आते आते
हज़ारों पलों की सौगातें समेट लाना
बादलों के बीच बिजली का शोर 

अचानक से हाथ थामने को 
कर देती मजबूर 
वो तेज़ आवाज़ जब थमती 
चेहरे पर मोती बिखेर जाती

बारिश न थमे 
सिर्फ थमे तो यह वक़्त
उन चंद पलों में
जी ली उसने सारी ज़िन्दगी