तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन
जब गिरता था सूखी धरती पर
वो बारिश का पहला पानी
सारे अरमानों को जगा देती थी
मिट्टी की सौंधी खुशबू
दिल की किताब के जब पलटते हैं पन्ने
उस बारिश की एक बूंद
अब भी आँखों में कहीं अटकी हुई है
वो बारिश में भीगनें की उम्र
छप -छप करते तेरे वो कदम
पायल के घुंघरू की आवाज़ मुझे बुलाती थी
झलक दिख जाती अगर वो
बारिश की बूदें हथेली पर समेटने छत पर आती
उतना ही काफी था तमाम बंदिशों में
दिल कुछ और ज़्यादा नहीं मांगता था
तुम्हारी वो झलक ज़हन में
अब भी कहीं कैद है
बस वक्त के साथ उड़ गई
वो मिट्टी की और यादों की खुशबू
अब बारिश आती तो है
पर दिल को नहीं छूती
अब तो बस यादें हैं
एकांत में मुस्कुराने के लिए
तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन ।


