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Saturday, 9 May 2020

गांव बहुत दूर है

कारखाने से मिली बची तन्खा 
को लेकर 
लौटते समय मन ने सोचा, 
शायद ही अब दोबारा जी पाऊं 
घर की देहलीज़ पर 
कांपते कदमों ने अपनी बेबसी सुना दी 
मेरा काम छूट गया 
हमें अब पैदल ही 
अपने गांव जाना होगा 
पसीने से तर हथेली ने 
नोटों को कस कर भींच लिया 
कोई छुड़ा न ले जाए 
मासूम गोल मटोल आँखों का सवाल 

"बाबा मेरे जूते तो
सूरज काका ने सिए ही नहीं "
मेरे दिमाग के दरवाज़े बंद हैं
सोचने को कुछ नहीं है 
मेरी झोली में, 
रघु का दूसरा सवाल 
"बाबा मुन्नी ने तो 
चलना ही नहीं सीखा "
मन ने कहा अगर आता तो भी क्या 
मंज़िल अब धुआं धुआं है.. 

कजरी ने बचे हुए सामान को 
फैक्ट्री के कबाड़ खाने में रखा
तो आंसू की दो बूँद ने 
सामान पर अपने हस्ताक्षर कर दिए 
वापस मिलने की उम्मीद पर
कजरी का सवाल
"रघु के बाबा, हम वर्षों से
गांव नहीं गए 
तुम्हे रास्ता याद तो है ना "
उसके दिमाग में 
काम गूँज रहा है 
मशीनें शोर कर रही है 
साहब ने कहा था 
"जिस रास्ते को तुम बना रहे हो 
वो सीधा तुम्हारे गांव को जाता है "
मैं बहुत खुश था 
मेरा गांव और मेरे गांव को जाने वाली सड़क.. 
पर आज जब चल कर 
उसी सड़क से लौट रहा हूँ 
मेरे पसीने की बूंदे 
जो गिरी थी कॉन्क्रीट पर.. 
चमक रही है 
मृगमरीचिका बन कर 
अब इस अनिशचिता वाले
जीवन में 
मैं सड़क के 
न इस छोर पर हूँ 
न उस छोर पर 
बस अपनों का हाथ थामें 
इस आवारगी और 
बंजारेपन में 
शायद ही दोबारा जी पाऊं 
मौत तुम आना मत 
पहले मैं गांव तो 
पहुँच जाऊं ..

Friday, 9 June 2017

ये खामोशियाँ


ये खामोशियाँ और 
इनके अन्दर छिपी हुई 
सिसकियाँ , हिचकियाँ 
बहुत धीमे धीमे घुटती आवाज़ 
कानों में उड़ेल जाती हैं 
ढेर सारा गर्म लावा 
वो स्लो पॉयजन 
फैलता जाता है 
दिमाग की नसों में 
और वहाँ जा कर 
कोलाहल बन जाता है 
मैं भागती रहती हूँ 
शान्ति की तलाश में 
कभी कभी छुपने की 
जगह तलाशती हूँ
जहाँ कभी तुम होते थे 
तुम्हारे पीछे छुपने पर 
वो मसाले वाले हाथ 
तुम्हारी उजली शर्ट का 
मेरे मसाले वाले हाथों से 
ख़राब होने का मलाल 
तुम्हारे चेहरे पर
साफ़ नज़र आता था 
तुम्हारे पीछे छुपने पर भी 
दोनों बच्चे मुझे ढूढ़ कर 
जोर से खिलखिला देते थे 
वो छुपने का खेल कितना
मासूम हुआ करता था 
अब तो अपने आप से
अपने आप को छुपा लूं तो सही 
ये आँखों की नमी 
अब बोलती नहीं 
ये खामोशियाँ और 
इनके अन्दर छुपी हुई 
सिसकियाँ , हिचकियाँ