किसी की याद में अश्क बहाना है मना
आज कोइ नज्म नई बना
उस गली और मोड़ के शब्दों को ले
जहॉं तू कभी खड़ा था अकेले
तब भी तो तू सुकून से जीता था
आज फ़िर उन पुरानी राहों को नाप आ
जिनकी वीरानगी पर तू चलकर होता था ख़फ़ा
गम दे कर भूल जाना जिसकी फ़ितरत थी
तूने क्यों उसकी यादों को
सीने से लगाने की जरूरत की
पुरानी यादों को रेज़ा-रेज़ा हो जाने दे
बेइन्तेहा बेकस हो कर डूब मत
परेशांहाली में मयख़ाने के अंदर
पैमाने मत तौल
बाहर आ और ख़ुली फ़िजा में सांस ले
चार कदम आगे बढ़ और ज़िदंगी को थाम ले
आज मेरी कलम ने किया है मना
किसी की याद में अश्क बहाना है मना
