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Friday, 16 June 2017

वो होली


वो खाकी शर्ट पर 
अब भी निशाँ होंगे 
पिछली होली के
वो अबीर का गुब्बार 
रंग कर चला गया था तुम्हे 
रंगो का इंद्रधनुष बिखेर गया था ख़ुशी 
गुलाल का रंग 
दहकते गालों में 
खो गया था 
तुम्हे रंगों की पहचान जो 
गहराइयों से थी 
अब के बरस 
बहुत सारा पानी भर था 
रंग नहीं 
वो तुम्हारी बातें 
झील सी आँखें
 रंग सारे तुम ले गए 
बस मेरे हिस्से का 
खारा पानी झीलों में
छोड़ गए 
वो शर्ट वो रंग के निशः 
वो होली 
बस गालों को भिगो गया 
खारा पानी