क्या तुम मुझे हो जानते
बस चंद है मेरी ज़रूरतें
किताब की दुकान देख रुक जाती हूँ
अच्छे और सुंदर सफे लिए बिना रह नहीं पाती हूँ
सुंदर कलम तलाशती आँखें
सांसारिक रंग ढ़ंग कुछ नहीं आता
बस कुछ लिख़ने के लिए एकांत मुझे है भाता
सुकून मिलते ही
मृगमरिचिका ख़ींचती है मुझे
पानी की तलाश की तरह विषय ढ़ूँढती आँखें
सफेद वस्त्रों पर
काले मुखौटों पर
इंसान के अंदर का जानवर या जानवर में छुपा इंसान
देश विदेश और समाज
वो मधुशाला और टूटते प्याले
नायिका का विरह
नायक की मौत
आँसुओं का सैलाब
वो बेवफ़ाइ का आलम
क्या कुछ नही देखता अपनी अंदर की आख़ों से
बेहतर सृजन की कोशिश में बीतता दिन
अजनबी रुक जाओ
कैसी लगी मेरी रचना इतना बताते जाओ
मै तुम्हें नहीं जानती पर
हमारी रचनाओं की आपस में गहरी दोस्ती है
