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Monday, 11 May 2015

मेरा आशियाना


तुम ऊँची -ऊँची मीनारे बनाओ
तुम खूबसूरत रास्ते बनाओ
नहीं बनती तुम्हारी  पहचान
क्योंकि तुम नींव का पहला पत्थर हो
हम चाहते है तुम इनमे कहीं खो जाओ
क्या तुम्हारी मंजिल है,तुम्हे नहीं पता है
पर एक से दूसरी,दूसरी से तीसरी मीनार पर  
अनबरत चलती जाती है
हर नई मीनार से
नया जन्म,नया सपना
और नया सफर शुरू होता है
जो रास्ते तुम बनाते हो
वो रास्ते तुम तक जाते ही नहीं
तुम्हारा गांव इन रास्तों से बहुत दूर है
रास्तों को सवारने में
जो पत्थर तुमने हटाए थे
वही अन्जाने में
तुमने अपनी राह में बिछाए है
मीनार के बनते ही
तुम्हारा छोटा सा आशियान
जिसकी कोई तुलना ही नहीं मीनार से
कब झोंपड़ी शब्द में तब्दील हो कर
अपना अस्तिव खो देता है
इसकी छत के नीचे,मौसम की अदला -बदली
और कुछ मीठी यादें
टूटी छत में,अब भी टंगी हैं
छोटी का पालना,और मुन्ने की चकरी
मीनार की खूबसूरती की चर्चा है चारो और
बस चुभ रहा है तो झोंपड़ा
तुम्हारे अंदर का तूफान,जिसे कोई नहीं सुन रहा
वह बहुत बौना हो गया है
तुम्हारा नया आशियाना है कहीं और
शायद कोई नई मीनार ?