कर्मों का लेखा जोखा
शारीर नहीं दे कहीं धोखा
सहारे वाले हाथ नहीं हैं
अब बच्चों व रिश्तेदारों की बारात नहीं है
अकेली सुबह है
खाली और काली संध्या है
सन्नाटे बन गए कान के बाले
लटक-लटक कर शोर करते हैं
आराम कुर्सी है हिलने वाली
कुर्सी स्थिर है हिल रहा शारीर
कितनी लाचारी और बेबसी
आँखें दूसरों से
आस और अपनापन मांगती सी
टूटती उम्मीद बुझती लौ
बिखरते सपने टूटे कांच से
एक - एक नश्तर चुभता दिल पे
प्राण रखे हैं बीच में दो सिल के
धीरे - धीरे सब कुछ घुटता जाता है
क्या खोया क्या पाया
कुछ भी समझ न आया
भारी मन, हाथ खाली है
चलो अब वृद्धावस्था की तैयारी है
शांत वन में सहारे वाली लकड़ी की ठक - ठक
लड़खड़ाते कदमों की धक - धक
बिन आंसू रोती आँखें
शून्य में खो जाती हैं
बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा
शान्त मन रहता, अब नहीं खोता आपा
जीवन की संध्या में कल के सूरज की आस नहीं है
अब तो बस वृद्धावस्था की तैयारी |
