वो गर्मी की चांदनी रातें
बेवजह की बेमतलब की बातें
कितनी ठंडक थी उन रातों में
अब भी समाई है कहीं यादों में
वो बिछौने और उन पर डले गुलाबी चादर
अपने अपने हिस्से के तारों को
गिनने की आदत
वो सारे दोस्तों का छत पर
हुजूम लगाना
देर तक जाग कर
बातों में मशरूफ हो जाना
वो वक़्त था या
मुट्ठी की रेत
अब दिलों की तपिश में
वो ठंडक घुल गयी है
वो चादरें महताब
अब बंट गया है
अपने अपने हिस्से के तारों में
वो याराना बातें
अब सलीकों में ढल गयी है
अब अरसे से बंद पड़े
छत पर जाने वाले दरवाजे में
दीमक पड़ गयी है औपचारिकता की
अब कभी नज़र उठा के
आसमान की ओर देखती भी हूँ
तो वह मुझे पागल की उपमा देकर
मुस्कुरा देती है
