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Sunday, 28 January 2018

अजनबी अजनबी


यह जीवन जब 
भीड़ में गुम हो जाने के बाद 
धीरे - धीरे तन्हा होता है 
धीरे - धीरे पंखुड़ियों से 
सूख कर बिखर जाते हैं यह रिश्ते 
प्यार स्नेह और अपनेपन की 
टूट जाती है माला 
धीरे - धीरे हर मन का 
गिरता जाता है 
धीरे - धीरे कम हो जाता है 
अपनों की आवाज़ों का कोलाहल 
अल्फ़ाज़ बहुत हैं दिल में पर 
धीरे - धीरे शब्दों का 
अजनबी हो जाना
धीरे - धीरे ख़त्म होती 
अहसासों की धड़कन 
धीरे - धीरे कमज़ोर होते धागे 
अपने से अपनों तक के 
जिनमें  पड़  जाती है 
कई गाठें 
पहले इंसान 
अजनबी सी भीड़ में 
शामिल होता है 
भीड़ में खोकर अपना सब कुछ 
वापस भीड़ से अलग 
अजनबी बन जाता है 
हर एक शख़्स एक दुसरे से है 
अजनबी अजनबी . . . 

Saturday, 11 July 2015

मै कौन हूँ ?


मै कौन हूँ और क्या हूँ
क्या तुम मुझे हो जानते
बस चंद है मेरी ज़रूरतें 
किताब की दुकान देख रुक जाती हूँ 
अच्छे और सुंदर सफे लिए बिना रह नहीं पाती हूँ
सुंदर कलम तलाशती आँखें
सांसारिक रंग ढ़ंग कुछ नहीं आता 
बस कुछ लिख़ने के लिए एकांत मुझे है भाता 
सुकून मिलते ही 
मृगमरिचिका ख़ींचती है मुझे 
पानी की तलाश की तरह विषय ढ़ूँढती आँखें
सफेद वस्त्रों पर
काले मुखौटों पर 
इंसान के अंदर का जानवर या जानवर में छुपा इंसान
देश विदेश और समाज
वो मधुशाला और टूटते प्याले
नायिका का विरह 
नायक की मौत
आँसुओं का सैलाब 
वो बेवफ़ाइ का आलम 
क्या कुछ नही देखता अपनी अंदर की आख़ों से 
बेहतर सृजन की कोशिश में बीतता दिन 
अजनबी रुक जाओ
कैसी लगी मेरी रचना इतना बताते जाओ
मै तुम्हें नहीं जानती पर 
हमारी रचनाओं की आपस में गहरी दोस्ती है