वो ख़ामोशी बचपन में
हॉस्टल की
मेरे अंदर धीरे धीरे
घर करने लगी थी
शब्द जुबां पर कम
ज़ेहन में ज़्यादा
जमा होने लगे थे
कलम कागज़ की
किल्लतें हो चली थी
स्याही की दवातों के
अम्बार भरभराने लगे थे
कमरा टेबल और मैं
शब्दों से भरे
कागज़ों का ढेर
बचपन के साथ साथ
बढ़ते गए भावनाओं के चिनार
चन्द दिनों भीड़ में
गुज़ारने के बाद
वापस खामोशी की ओर
रुख करना
भीड़ में रूबरू हो ही नहीं पाते
की रुखसती का वक़्त आ जाता
इस आने जाने के
मुसाफिर बनने के बीच
मन करता
यहीं कहीं बड़ा सा
बरगद का पेड़ बन जाऊँ
ढेर सारे परिंदे जमा हो
और उनको मैं अपने
जज़्बातों को सुनाऊँ...

मन को छू गई आपकी भावाभिव्यक्ति
ReplyDeleteआदरणीय सर बहुत शुक्रिया आपका
Deleteमेरे द्वारा लिखा गया पांच लिंकों का आमंत्रण नहीं दीख रहा मधुलिका जी,कृपया स्पैम में चेक करियेगा।
ReplyDeleteसादर।
बहुत शुक्रिया आदरणीया श्वेता जी मेरी रचना को पांचलिंको का आंनद में स्थान देने पर
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आदरणीय सर
Deleteबचपन की यादें दिल में अक्सर चहलक़दमी करती हैं, सुंदर अभिव्यक्ति!
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आदरणीया अनीता जी
Deleteसुंदर सृजन!
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आदरणीया शुभा जी
Deleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आदरणीय वर्मा जी
Deleteखामोशी ... कौन सुने ये शब्द ... जज्बात की गहरी उड़ान ...
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया आदरणीय सर
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