एक विशाल वृक्ष जिसकी जड़ें बहुत गहरी हों
जिसकी शाखाएँ बहुत लम्बी हों
जिससे मुझे एक ठहराव मिले
पर ईश्वर ने मुझे बनाया है
एक सुंदर और कोमल पौधा
जिसे हर कोइ अपनी मर्जी से रोपता है
वो जैसे-जैसे बड़ा होता है
वैसे -वैसे उसका स्थानांतरण होता है
मुझे रखने वाले पात्र की पहचान बदलती जाती है
कभी पिता,कभी पती,कभी बेटा
पौधा जगह बदलते, बदलते
कुम्हला जाता है
हर बार अपनी जड़ें जमाने
की कोशिश में और उखड़ जाता है
सभी को उम्मीदें हैं उससे
ढेर सारी छाँव की
फ़ल पत्तियाँ और छाल की
कोइ भी पौधे के मन के अंदर नहीं झाँकता
पौधा घुटन भरी चीख से चींख़ता है
मैं एक विशाल वृक्ष बनाना चाहता हूँ
कोमल पौधा नहीं
