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Thursday, 20 August 2015

विशाल वृक्ष


मैं बचपन से वृक्ष बनना चाहती थी 
एक विशाल वृक्ष जिसकी जड़ें बहुत गहरी हों 
जिसकी शाखाएँ बहुत लम्बी हों 
जिससे मुझे एक ठहराव मिले 
पर ईश्वर ने मुझे बनाया है
एक सुंदर और कोमल पौधा 
जिसे हर कोइ अपनी मर्जी से रोपता है 
वो जैसे-जैसे बड़ा होता है 
वैसे -वैसे उसका स्थानांतरण होता है 
मुझे रखने वाले पात्र की पहचान बदलती जाती है 
कभी पिता,कभी पती,कभी बेटा 
पौधा जगह बदलते, बदलते
कुम्हला जाता है 
हर बार अपनी जड़ें जमाने
की कोशिश में और उखड़ जाता है
सभी को उम्मीदें हैं उससे 
ढेर सारी छाँव की
फ़ल पत्तियाँ और छाल की 
कोइ भी पौधे के मन के अंदर नहीं झाँकता 
पौधा घुटन भरी चीख से चींख़ता है 
मैं एक विशाल वृक्ष बनाना चाहता हूँ 
कोमल पौधा नहीं