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Friday, 14 August 2015

मेरा प्यारा गाँव


सोच रहा हूँ आज अपने गाँव लौट ले
गांवों में अब भी कागा मुंडेर पर नज़र आते हैं
उनके कांव - कांव से पहुने घर आते हैं 
पाँए लागू के शब्दों से होता है अभिनंदन
आते ही मिल जाता है 
कुएँ का ठंडा पानी और गुड़ धानी
नहीं कोइ सवाल क्यों आए कब जाना है 
नदी किनारे गले मे बाहें डाले 
कच्चे आम और बेरी के चटकारे
और वो सावन के झूले
आंसू से नयन हो जाते गीले 
वो रात चाँदनी, मूंज की खाट 
बाजरे की रोटी चटनी के साथ
बीते बचपन की गप्प लगाते 
दिल करता कभी न लौटे शहर 
जहाँ जिंदगी बन गई तपती दोपहर 
जहाँ नहीं है उचित
जाना हो बिना सूचित
अच्छा खाना है पर रिश्तों में स्वाद नहीं 
महंगी जरूर है वहाँ की शामे 
पर तारों वला आसमान नहीं खरीद पाते 
 प्यार से गले में बाहँ डाल फरमाते
हाँ तुम्हें जाना कब है रिज़र्वेशन तो होगा 
नज़रें चुरा के कह जाते की 
वक्त पता नहीं कहाँ गुम है 
वो मूंज की ख़ाट और गहरी नींद 
नर्म बिछोने पर करवट बदलते रात भर 
बड़े घर में छोटा सा दिल
और वहाँ छोटी सी झोपड़ी में दो ख़ुली बाहें