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Wednesday, 15 April 2026

जब बारिश मुस्कुराई

आज बारिश बरसते हुए 

मेरे साथ मुस्कुराई 

उसने कहा, आज मैं 

आँखों के पानी की तरह 

नहीं बरसूँगी 

मुस्कुराहट के मोतियों सी 

बिखरुंगी 

कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी 

खिड़की के शीशे पर 

देर तक ठहरूंगी 

तुम वही बैठ कर 

कुछ लिखना 

मैं तुम्हारी स्याही को 

नहीं फैलाउंगी 

पर आज तुम मुस्कुराना 

आज मैं तुम्हारे शहर से

दूर नहीं जाउंगी

तुम कॉफ़ी का मग 

खिड़की पर ही रखना 

भाप और ओस से 

धुंधले हुए शीशे पर 

अपनी अँगुलियों से

उन गुज़री हुई 

तारीखों को लिखना 

कब तुम्हारी मुस्कुराहट 

खिलखिलाहट में बदल गई 

और कब डायरी 

इंतज़ार शुरू और खत्म 

होने की तारीखों 

दिनों महीनों सालों की कहानी 

उन उजले सफों पर 

स्याही में तब्दील हो गई ...  

Saturday, 21 October 2023

आओ मौसम की पहली बारिश में ज़िंदगी ढूँढे


 पिछली बारिश के जमा पलों की गुल्लक खोलें 
उसमें थे बंद कुछ पल रजनीगंधा से महके हुए 
कुछ पल सिलाइयों से उधड़े हुए 
कुछ पल जो हमने वक़्त से थे चुराए भीगे से 
पहली बारिश की नम मिट्टी से सौंधे अल्फ़ाज़ 
आँगन के गड्ढों में जमा हुआ पानी 
काग़ज़ की नाव बनाकर
ख़ुशियों से मुस्कुराते चेहरे 
सीली हुईं लकड़ी से उठता हुआ धुआँ 
चाय में घुला हुआ 
धुएँ के इस पार वजूद है 
उस पार बस एक ख़लिश है 
पहली बारिश में 
ज़िंदगी ढूंढता हर शख़्स 
आओ पहली बारिश में ज़िंदगी ढूंढें ...  

Saturday, 16 September 2023

बारिश का मौसम आ गया



बहुत अरसों से पहली बारिश में भीगा करती थी 

अपने चेहरे को ऊपर करके

दोनो हथेलियों को खोल कर 

पता नहीं क्यों वो भीगना

मुझे बहुत ही सुकून देता 

वो भीगने का सिलसिला 

साल दर साल चलता रहा 

बारिश का मौसम आता

और मेरे अंतर मन के 

घुटन के सारे सैलाब को 

बह ले जाता ।

आँखों के कोरों के मोतियों को 

अपनी बूँदों में मिलाने का जादू 

बारिश को ही आता है ।

मेरे ज़हन को हल्का करके 

वो मोती कहीं किसी

सीप में बंद हो जाते होंगे ।

बहुत ही ज़हीन सा लफ़्ज़ है बारिश

बड़ा इंतेज़ार रहता है 

पहली बारिश का 

बूँदे और बारिश कि आवाज़ 

घंटों सुनते रहने के बाद भी 

पहली मुलाक़ात सी नई लगती है 

इस बरस भी 

बारिश का मौसम आने वाला है 

भीगना है मुझे क्योंकि 

पिछली बारिश की बूँदों

के निशान को मिटाने

गुज़रे हुए लम्हों को मिट्टी में दबाने 

नई बूँदें आयी हैं 

बारिश का मौसम आ गया ।

Saturday, 15 August 2020

तुम्हारे शहर की बूँदें


 बारिश में जब भी तुम्हारे 

शहर गया 

न तो तुम दिखी 

न मुलाक़ात हुई 

पर बहुत सी बूँदें 

तुम्हारे शहर की 

छाते में सिमट कर आ गईं 

कई दिनों से 

वो यादों की सीलन 

महका रही थीं 

कमरे को 

उन्हें मिटाने के लिए 

आखिर मैंने

आज कड़ी धूप में 

छाता खोल कर सुखा दिया




Tuesday, 5 June 2018

उम्र ठहरती नहीं


एक उम्र जो गुम हो गई 
आज बहुत ढूंढा मैंने
अपनी उम्र को 
पता नहीं कहाँ चली गई 
नहीं मिली
रेत की तरह 
मुट्ठी से फिसल गई
या रेशा रेशा हो कर 
हवा में उड़ गई
बारिश की बूँद की तरह
मिट्टी में गुम हो गई
सूरज की किरणों के साथ
पहाड़ों के पीछे छिप गई
वो मुझे जैसे छू कर
कहीं ठहरी ही नहीं
गुज़रती ही गई
हम उम्र के अंदर
कहीं ठहर जाते हैं
पर उम्र हममें कहीं नहीं ठहरती
ढलान से लुड़कता हुआ
मिट्टी का मर्तबान है 
ये ज़िन्दगी
आखिर में जीवन
टूट कर बिखर जाता है
पंचतत्त्व में
विलीन होने के लिए

Thursday, 24 September 2015

जीवन का मतलब


धीरे -धीरे जिंदगी से शिकायतों की गठरी भर ली 
उस गठरी से बहुत कुछ अच्छा
पीछे छूटकार बिख़रता गया
जिसे न बटोर पाए न वक्त से देख़ा गया 
अब जिंदगी बेतरतीबि से रख़े सामान की तरह हो गई है
मन करता है की काश?
जिंदगी रेशम पर पड़ी सिल्वटों सी होती 
मुट्ठी भर पानी के छीटें मारते 
प्रेस करते और नए सिरे से जीते 
या जिंदगी की इबारत 
कच्ची स्याही से लिखी होती 
अगर बारिश में भीग चुकी होती 
नए सफ़े से फ़िर शुरू होती
पर नहीं कुछ बदल पाते 
उन्ही सिलवटों में बाहर निकलने
का रास्ता ढूंढ़ते 
पक्की स्याही का रंग नहीं धुलता 
इसलिए जीवन में रंग सजाने की
कोशिश जारी रख़ते 
फ़िर से जीने की तमन्ना में
तमाम रातें मौत को गले मिलने का न्यौता देकर
धोख़े से रास्ता बदल लेते हैं
क्या करे सिलवटों और फ़ैली स्याही में 
जीने की आदत जो बरसों से पड़ी है
क्या इंसान वाकई जीवन का मतलब
सारी ज़िंदगी समझ नहीं पाते 

Friday, 3 July 2015

तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन


तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन
जब गिरता था सूखी धरती पर 
वो बारिश का पहला पानी
सारे अरमानों को जगा देती थी
मिट्टी की सौंधी खुशबू
 दिल की किताब के जब पलटते हैं पन्ने 
उस बारिश की एक बूंद
अब भी आँखों में कहीं अटकी हुई है 
वो बारिश में भीगनें की उम्र 
छप -छप करते तेरे वो कदम 
पायल के घुंघरू की आवाज़ मुझे बुलाती थी 
झलक दिख जाती अगर वो
बारिश की बूदें हथेली पर समेटने छत पर आती 
उतना ही काफी था तमाम बंदिशों में
दिल कुछ और ज़्यादा नहीं मांगता था 
तुम्हारी वो झलक ज़हन में
अब भी कहीं कैद है
बस वक्त के साथ उड़ गई
वो मिट्टी की और यादों की खुशबू
अब बारिश आती तो है
पर दिल को नहीं छूती
अब तो बस यादें हैं 
एकांत में मुस्कुराने के लिए
तेरे जाने के बाद से न आया वैसा सावन ।

Tuesday, 16 June 2015

सावन की बूँदें


सावन की बूँदें जब 
टिप -टिप हथेली पर गिरती हैं 
एक -एक यादों की पहेली 
धीमें- धीमें खुलती है

दिल में बंद यादों की पहेली
वो है उसकी सबसे अच्छी सहेली
खुलती है जब खिलखिलाति है तब
बीते सुनहरे पलों में वो उसे ले जाती है 

जहाँ थी भीगी चुनरी
झूले की पीगें
धूएँ की सौंधी खुशबू 
गर्म चाय के प्यालों में घुलती थी 
वो नज़रों का कहीं थम जाना 

कुछ पल ठहरना
ठहर कर वापस आ जाना
वापस आते आते
हज़ारों पलों की सौगातें समेट लाना
बादलों के बीच बिजली का शोर 

अचानक से हाथ थामने को 
कर देती मजबूर 
वो तेज़ आवाज़ जब थमती 
चेहरे पर मोती बिखेर जाती

बारिश न थमे 
सिर्फ थमे तो यह वक़्त
उन चंद पलों में
जी ली उसने सारी ज़िन्दगी