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Monday, 29 March 2021

धूप सुनहरी तेरे आँगन की


तेरे आँगन की धूप सुनहरी चमकीली 

मेरे घर की मसाले वाली चाय अदरक की 

बस दो छोटे से बहाने थे 

गुलाबी ठण्ड बिताने के 

धूप की चमक आँखों में 

बातों का सिलसिला किताबों में 

मासूम सी मुलाक़ात 

बहुत जल्दी में 

ढलती वो चटकीली धूप 

मलाल तो रहता है 

घाटियों सी उदासियाँ 

कल की धूप बहुत कुछ 

पार करके आएगी 

बादलों को भी तो

कभी कभी 

कुछ काम नहीं होता 

बेमौसम बरस कर 

सूरज को छिपा आते हैं कहीं 

काश सूरज तेरे घर के 

काँच के जार में 

बंद रहता 

बनी रहती धूप सुनहरी 

तेरे आँगन की 

और अदरक वाली चाय 

मेरे घर की 



Saturday, 15 August 2020

तुम्हारे शहर की बूँदें


 बारिश में जब भी तुम्हारे 

शहर गया 

न तो तुम दिखी 

न मुलाक़ात हुई 

पर बहुत सी बूँदें 

तुम्हारे शहर की 

छाते में सिमट कर आ गईं 

कई दिनों से 

वो यादों की सीलन 

महका रही थीं 

कमरे को 

उन्हें मिटाने के लिए 

आखिर मैंने

आज कड़ी धूप में 

छाता खोल कर सुखा दिया




Friday, 21 July 2017

ज़िन्दगी धूप की तरह ढलती


वह छत के कोने में 
धूप का टुकड़ा 
बहुत देर ठहरता है 
उसे पता है
अब मुझे काफी देर 
यहीं वक़्त गुज़ारना है 
क्योंकि वह शाम की 
ढलती धूप जो होती है 
उम्र के उस पड़ाव की तरह 
और मन डर कर 
ठहर जाता है 
ठंडी धूप की तरह
जब अपने स्वयं के लिए 
वक़्त ही वक़्त है
अब घोंसले में अकेले 
पक्षी की तरह 
अब सब उड़ना सीख गए
आँखों में जो अकेलापन बस गया है 
उसे कहीं तोह छिपाना है 
कहाँ - कहाँ 
चश्मे के पीछे 
अखबार के पन्नों में 
पार्क की किसी खाली बेंच 
या 
छत का कोना 
क्योंकि वो ढलती धूप 
मेरे बहाने जानती है 
इसलिए रुकी रहती है 
काफी वक़्त तक 
मेरे लिए 
क्योंकि अब 
मुझे काफी देर 
यहीं वक़्त गुज़ारना है |