Thursday, 3 August 2017

क्यों बेकार में खामखा की ज़िद


कई दिनों से खामखा की ज़िद 
वह श्रृंगार अधूरा सा क्यों है 
अब क्या और किस बात की जिरह 
मेरे पास नहीं है वो ज़ेवर 
जो तुम्हे वर्षों पहले चाहिए थे
वह सब मैंने ज़मीं में दफ़न कर दिया है 
हालात बदल गए हैं 
तुम उस ख़ज़ाने को ढूंढना चाहते हो 
और चाहते हो की उस
एक एक आभूषण को 
मैं धारण कर लूँ 
वो ख़ज़ाने का सामान 
वो कहकहे वो इंतज़ार 
वो आँखों की चमक 
वो गालों का दहक उठना 
वो बातों की खनक 
सब तुम्हारी आखरी मुलाक़ात के बाद 
वहीं दफ़न कर दिया था 
क्योंकि मुझे उन गहनों की
आदत नहीं रही 
वो श्रृंगार अब नहीं कर सकती 
क्यों बेकार में खामखा की ज़िद 

Friday, 21 July 2017

ज़िन्दगी धूप की तरह ढलती


वह छत के कोने में 
धूप का टुकड़ा 
बहुत देर ठहरता है 
उसे पता है
अब मुझे काफी देर 
यहीं वक़्त गुज़ारना है 
क्योंकि वह शाम की 
ढलती धूप जो होती है 
उम्र के उस पड़ाव की तरह 
और मन डर कर 
ठहर जाता है 
ठंडी धूप की तरह
जब अपने स्वयं के लिए 
वक़्त ही वक़्त है
अब घोंसले में अकेले 
पक्षी की तरह 
अब सब उड़ना सीख गए
आँखों में जो अकेलापन बस गया है 
उसे कहीं तोह छिपाना है 
कहाँ - कहाँ 
चश्मे के पीछे 
अखबार के पन्नों में 
पार्क की किसी खाली बेंच 
या 
छत का कोना 
क्योंकि वो ढलती धूप 
मेरे बहाने जानती है 
इसलिए रुकी रहती है 
काफी वक़्त तक 
मेरे लिए 
क्योंकि अब 
मुझे काफी देर 
यहीं वक़्त गुज़ारना है | 

Friday, 16 June 2017

वो होली


वो खाकी शर्ट पर 
अब भी निशाँ होंगे 
पिछली होली के
वो अबीर का गुब्बार 
रंग कर चला गया था तुम्हे 
रंगो का इंद्रधनुष बिखेर गया था ख़ुशी 
गुलाल का रंग 
दहकते गालों में 
खो गया था 
तुम्हे रंगों की पहचान जो 
गहराइयों से थी 
अब के बरस 
बहुत सारा पानी भर था 
रंग नहीं 
वो तुम्हारी बातें 
झील सी आँखें
 रंग सारे तुम ले गए 
बस मेरे हिस्से का 
खारा पानी झीलों में
छोड़ गए 
वो शर्ट वो रंग के निशः 
वो होली 
बस गालों को भिगो गया 
खारा पानी 

Friday, 9 June 2017

ये खामोशियाँ


ये खामोशियाँ और 
इनके अन्दर छिपी हुई 
सिसकियाँ , हिचकियाँ 
बहुत धीमे धीमे घुटती आवाज़ 
कानों में उड़ेल जाती हैं 
ढेर सारा गर्म लावा 
वो स्लो पॉयजन 
फैलता जाता है 
दिमाग की नसों में 
और वहाँ जा कर 
कोलाहल बन जाता है 
मैं भागती रहती हूँ 
शान्ति की तलाश में 
कभी कभी छुपने की 
जगह तलाशती हूँ
जहाँ कभी तुम होते थे 
तुम्हारे पीछे छुपने पर 
वो मसाले वाले हाथ 
तुम्हारी उजली शर्ट का 
मेरे मसाले वाले हाथों से 
ख़राब होने का मलाल 
तुम्हारे चेहरे पर
साफ़ नज़र आता था 
तुम्हारे पीछे छुपने पर भी 
दोनों बच्चे मुझे ढूढ़ कर 
जोर से खिलखिला देते थे 
वो छुपने का खेल कितना
मासूम हुआ करता था 
अब तो अपने आप से
अपने आप को छुपा लूं तो सही 
ये आँखों की नमी 
अब बोलती नहीं 
ये खामोशियाँ और 
इनके अन्दर छुपी हुई 
सिसकियाँ , हिचकियाँ 

Tuesday, 6 June 2017

मेरे शहर में तू क्या आया


बाद मुद्दत के मेरे शहर में 
तू क्या आया
हवा का झोंका
तेरे आने का 
संदेसा लाया 
यादों में वो तेरा 
चेहरा उभर आया 
लबों ने हौले से 
पुराने नगमों को 
गुनगुनाया 
आँखों में आंसू जो
मोती बनके थे अटके 
आज न चाह के भी
कहीं वो न जाएँ छलकें 
जो इंतज़ार था तेरे लिए 
वो आज भी बरक़रार है 
तेरा सफ़र तुझे ले गया 
अपने ठिकाने
मेरे शहर की गलियाँ
सूनी रह गई
बाद जाने के लिए 
वो अब ढूंढ रही थीं 
तेरे आने के बहाने 
बाद मुद्दत के मेरे शहर में 
तू क्या आया |