वो मुलाक़ात का सफ़र
बहुत ख़ास कुछ भी नहीं
अपने पर अपनी ही ज़फ़र
उन यादों को बक्से में समेट कर
हज़ारों मील दूर चले जाना
एक एक यादों को रोपना
बीज और नन्हे पौधे से
बरगद तक का सफ़र
कभी अपने में खोकर
सारी यादों की चादर
समेट कर ओढ़ना
कभी ज़िम्मेदारियों में
खोकर सारी यादों
को भूल जाना
अपने वजूद को भूल जाना
ये यादों का आना और जाना
मेरे वैद्य ने तो इसे
अल्ज़ाइमर का नाम दे डाला
हाँ शायद सच ही है
तेरी यादों का अल्ज़ाइमर ।
