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Wednesday, 17 February 2021

अब टूट कर न बिखरे, ये बचे हुए सपने


 मैंने अपने हिस्से के कुछ सपने 

छुपा दिए थे उम्मीदों के आसमान में 

सोच रही हूँ वहाँ जा कर 

ले आऊं उन्हें 

मेरे रोशनदान पर एक बुल बुल 

रोज दाना चुगने आती है 

मैंने उससे कहा तुम्हारे 

पंख मुझे उधार देदो 

मैं स्त्री हूँ 

मैं सपने देख भी सकती हूँ 

सपने चुरा भी सकती हूँ 

पर सपनों में जीना 

तमाम पाबंदियों के बीच 

सपनों को यूं 

आकाश से उठा लाना 

नहीं संभव है 

इन कोशिशों में 

कई पंख जल गए 

कितने सपने जब भी लाइ 

वो हालातों के पर्वतों से टकरा 

चूर चूर हो गए 

कुछ लावा बन कर पिघल गए 

पता नहीं रेजा रेजा हो कर 

कहाँ बिखर गए 

बंदिशों की आग और आंधी 

बचे हुए सपने

अब टूट कर न बिखरे 

तुम सुन रही हो न 

तुम्हारे पंख मेरे सपने 

तुम्हारे रंगीन पंखों सा 

रंग भरूंगी उन सपनों में 

मुझे तुम्हारे पंख चाहिए 

न टूटे, न उम्मीदों के दामन से 

मेरा हाथ छूटे ...

Wednesday, 20 May 2015

अरुणा शानबाग को श्रद्धांजली



जिस्म ने अपनी
हल - चल खो दी थी  
पर आत्मा अब भी
जंग लड़ रही थी
कानो में पिघल रहा था
लाचारी बेबसी और  
भयानकता का शोर
जिस मोड़ पर देखे थे
सुनहरे सपने  
मन के अंधेरे कोने में
बंद पड़े थे
आत्मा ने बहुत कोशिश की
इन बेजान सांसो में
फिर खुशियाँ भर पाँऊ
मन के अंधेरे कोने में
बंद पड़े सुनहरे सपनों
की गठरी को
खोल कर सजाया भी
उसके सामने, पर
हालात से चोट खाया जिस्म
आत्मा के मोह में नहीं आया
वह अपने सुनहरे सपनों को लेकर
वापस ज़िन्दगी की ओर
मुड़ नहीं पाया ।

Monday, 18 May 2015

मेरा घर कहाँ है माँ


माँ तुम बचपन से
कहती आई हो
एक दिन मैं अपने घर जाउंगी
और अपने सपने
पूरे कर लूंगी
पर माँ वहाँ जो
मेरे अपने रहते हैं
वो कहते हैं
“यह मेरा घर है
यहाँ सपनों वाली नींद की
सख़्त पाबन्दी है।”